योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) श्रीशैलपर्वत--करनाल जिले के अन्तर्गत कृष्णा नदी के दक्षिण तीर में; कृष्णा-स्टेशन से ५० मील । यहाँ द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में अन्यतम लिङ्ग विद्यमान है। यह योगिजन-निवास के रूप में प्रसिद्ध है । ब्रह्मरन्ध्रगते वायौ गिरेः प्रस्रवणं भवेत् । शृणोति श्रवणातीतं नादं मुक्तिर्न संशयः १ ॥२९॥ [ १. कई संस्करणों में यह श्लोक नहीं मिलता । इसके प्रक्षिप्त होने की सम्भावना है । प्रस्तुत ग्रन्थ उपजाति-छन्द में रचित है । २८ वें श्लोक में अन्य छन्द (वसन्ततिलक) का व्यवहार है, जिससे ज्ञात होता है कि यह इस ग्रन्थ का अन्तिम श्लोक है । २८ वें श्लोक का भाव भी ऐसा है कि इसके बाद अभ्यास के विषय में कुछ कहने के लिए रह नहीं जाता । ] अनुवाद-वायुके ब्रह्मरन्ध्र में स्थिर होने पर गिरि का प्रस्रवण होता है (गिरि से धारा निकलती है), इस अवस्था में श्रवणातीत ( = अश्राव्य ) नाद सुना जाता है, अतः मुक्ति होती है—इसम कोई संशय नहीं है । व्याख्या-ब्रह्मरन्ध्र - आधुनिक शारीर शास्त्र में यह anterior fon- tanelle कहलाता है; भेलसंहिता में इसे शिरस्तालु कहा गया है । शरीर में कई छिद्र (रन्ध्र) हैं; जिनमें ब्रह्मरन्ध्र दशम है--यह आयुर्वेदीय मत प्रसिद्ध है (दशमं रन्ध्रं मस्तके चोक्तम् । तद् ब्रह्मरन्ध्रमित्याहुरेके; एतानि नव स्रोतांसि नराणां बहिर्मुखानि भवन्ति, दशमं मस्तके प्रच्छन्नम् - शार्ङ्गधर पर आढमल्ल की टीका) । वायु की ब्रह्मरन्ध्र की ओर गति के विषय में ब्रह्मानन्द का वाक्य मननीय है-कुण्डलिनीबोधे सुषुम्नामार्गेण प्राणो ब्रह्मरन्ध्रं गच्छति; तत्र गते चित्तस्थैर्यं भवन्ति, चित्तस्थैर्ये संयमाद् आत्मसाक्षात्कारो भवति (ज्योत्स्ना १।४८) । प्राणायामाभ्यास की तृतीय अवस्था (जिसको 'उत्तम' कहा जाता है) में प्राण ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचता है (ज्योत्स्नाटीका २।१२) । गिरिप्रस्रवण--यह 'गिरि' क्या है, यह स्पष्ट नहीं है । संभवतः यह भ्रूकूट