भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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३ ( ३३ ) पाठ है। योगियाज्ञवल्क्य में 'गिरिप्रस्रवणं यथा' कहकर गिरिप्रस्रवण की उपमा दी गई है—गिरिप्रस्रवण को एक घटना के रूप में नहीं कहा गया (आमूर्धो वर्तंते नादो वीणादण्डवदुत्थितः। शङ्खध्वनिनिभस्त्वादौ मध्ये मेघध्वनिर्यथा ॥५७। व्योमरन्ध्रगते नादे गिरिप्रस्रवणं यथा, ६।५७-५८ क०)। तुल० मेरुशृङ्गे स्थितश्चन्द्रो द्विरष्टकल्यान्वितः। अहर्निशं त्वसौ आत्मसुधां वर्षत्यधोमुखः। (योगचिन्ता० पृ० १०७ में उद्धृत अमृतसिद्धि-नामक योगग्रन्थ का वाक्य)। क्या गिरि = पूर्णगिरि है ? (द्र० योगचि० पृ० १२२)। जो ध्वनि आघातजन्य नहीं होती वह इस शास्त्र में नाद कहलाती है ( नाद = अनाहतध्वनि; ज्योत्स्नाटीका ३।६४ ।¹ नमो योगाय योगेश्वराय च १. निम्नोक्त श्लोक कुछ संस्करणों में अन्तिम श्लोक के रूप में पठित हुआ है— विचरतु मतिरेषा निर्विकल्पे समाधौ कुचकलशयुगे वा कृष्णसारेक्षणानाम्। चरतु जडमते वा सज्जनानां मते वा मतिकृतगुणदोषा मां विभुं न स्पृशन्ति। [ अवश्य ही यह श्लोक अर्वाचीन काल में संयोजित हुआ है। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषय से श्लोकोक्त दृष्टि की संगति नहीं है ]