योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः 'पिण्डरूपस्य मन्त्रस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु। अर्धेन्दुबिन्दुनादान्तशून्योच्चाराद् भवेच्छिवः ॥ इति । (वि० भै०, श्लो० ४२) अत्र 'बिन्द्वर्धेन्दु' इति वक्तव्ये वृत्तानुरोधेन व्यत्यासः । बिन्द्वर्धेन्दुनादान्त- शून्योच्चाराद् भवेच्छिव इति प्रत्याहाररीत्या ग्रहणम् । अर्धेन्दोरुपरि रोधिनी- नादयोर्नादान्तस्य चोपरि शक्तिव्यापिकासमनानां च विद्यमानत्वात् । शून्यशब्दे- नोन्मना उच्यते । अतोऽर्धेन्दुबिन्दुनादान्तशून्योच्चाराद् भवेच्छिव इति २पिण्डरूपस्य मन्त्रस्य संग्रहेणोक्तिः ॥३३-३४॥ देशकालानवच्छिन्नं तदूर्ध्वे परमं महत् । निसर्गसुन्दरं तत्तु परैरानन्दविघूर्णितम् ॥३५॥ तदूर्ध्वे हकारादिमहाबिन्द्वन्तानां सकल-सकलनिष्कल-केवलनिष्कलानां त्रयाणामप्यूर्ध्वे । परमं महत् । महत्त्वं घटादीनामप्यस्ति न्यूनपरिमाणापेक्षया, अत उक्तं परमिति । यतः परं महत्त्वं नास्ति तत् परमं महत् । अत एव देशकालान- ॐकार, ह्रींकार प्रभृति पिण्ड मन्त्रों के स्थूल वर्णों का क्रमशः उच्चारण करने के बाद बिन्दु, अर्धचन्द्र, नाद, नादान्त आदि सूक्ष्म कलाओं का क्रम से उच्चारण करने से साधक शिव हो जाता है ॥ विज्ञानभैरव के इस श्लोक में 'बिन्द्वर्धेन्दु' ऐसा पाठ होना चाहिये, किन्तु छन्द की दृष्टि से 'अर्धेन्दुबिन्दु' ऐसा पाठ है । बिन्दु, अर्धेन्दु, नादान्त और शून्य का उच्चारण करने से शिव बन जाता है, इस वाक्य में प्रत्याहार की पद्धति अपनाई गई है । इससे अर्धेन्दु के बाद रोधिनी और नाद का तथा नादान्त के बाद शक्ति, व्यापिका ओर समना कलाओं का उच्चारण अभिप्रेत है । शून्य शब्द यहाँ उन्मना का बोधक है । अतः 'अर्धेन्दुबिन्दु' श्लोक की इस पंक्ति के द्वारा पिण्डमन्त्र की सभी कलाओं का संक्षेप में उल्लेख हुआ है, ऐसा माना जाना चाहिये ॥३३-३४॥ इसके ऊपर देश और काल आदि से अपरिच्छिन्न वह परम महान् स्वभाव- सुन्दर तत्त्व विद्यमान है, जो कि सदा परम आनन्द में लीन रहता है ॥३५॥ हकार से लेकर महाबिन्दु पर्यन्त कलाओं की यह जो त्रिविध – सकल, सकलनिष्कल और केवल निष्कल नाम की भावनाएँ बताई गई हैं, इन सबसे ऊपर वह परम महत् तत्त्व अवस्थित है । छोटे घड़े की अपेक्षा बड़े घड़े का भी परिमाण महत् (बड़ा) होता है, अतः यहाँ उसका विशेषण परम जोड़ा गया है । जिससे अधिक बड़ा कोई न हो, उसे १. वि० भै०, पृ० ४२। २. पिण्ड-क० ख०। ३. परमानन्द-च०, ख०, ग०, घ०, ङ०।