भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५१ <sup></sup>वाङ्मनोऽतीतगोचरत्वादुन्मनीत्युच्यते । महाबिन्दौ चाकाररूपवर्णोच्चारकाला न विद्यन्ते । अतो नात्रोच्यन्ते, तस्य विश्वोत्तीर्णत्वात् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोऽतीतगोचरम् ॥ अनिष्कलं चासकलं नीरूपं <sup></sup>निर्विकल्पकम् । निर्द्वन्द्वं परमं तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् ॥ इति । हकारादिबिन्द्वन्तानां स्थूलवर्णानामुच्चारणकालो मात्रा, बिन्द्वादिसमनान्ता- नामर्धमात्रा । तदर्धादिक्रमेण लवपर्यन्तमुच्चारणकालः । लवो नाम<sup></sup> नलिनीपत्रसंहत्यां सूक्ष्मसूच्यभिभेदने । दले दले तु यः कालः स कालो लववाचकः ॥ (प्र० सा० १।२९) इति वचनात् । तदूर्ध्वं<sup></sup> शून्य एव, तदधिकसूक्ष्मतरकालाभावात् । एवं- विध<sup></sup>भावनया शिव एव भूयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— आकर रुक जाती है । इसीलिये इसे उन्मना कहते हैं । महाबिन्दु में तो सुतरां आकार (रूप), वर्ण और उच्चारण काल की भी कोई स्थिति नहीं है, अतः उनका यहाँ वर्णन नहीं किया गया है, क्योंकि वह महाबिन्दु <sup></sup>विश्वोत्तीर्ण तत्त्व है । इसका वर्णन स्वच्छन्द- संग्रह में इस तरह से किया गया है— हे वरारोहे ! वाणी और मन से अगोचर, सभी तत्त्वों से अतीत यह महाबिन्दु अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है । यही शिव नामक परम पद है ॥ हकार से लेकर बिन्दु पर्यन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण काल एक मात्रात्मक है, बिन्दु से समना पर्यन्त कलाओं का काल अर्धमात्रा है । प्रत्येक आगे वाली कला में यह काल आधा होता जाता है । यह उच्चारण काल लव पर्यन्त सूक्ष्म होता है । प्रपंचसार में लव का लक्षण इस तरह से वर्णित है— कमल के सहस्र पत्रों को एक साथ रख कर उनको तीखी सुई से छेदते समय एक- एक पत्र के छेदन में जो काल लगता है, उसी को लव कहा जाता है ॥ इसके ऊपर कुछ भी नहीं है, क्योंकि इससे अधिक सूक्ष्म काल की कल्पना ही नहीं की जा सकती । इस तरह इन सूक्ष्म नाद-कलाओं का ध्यान करने वाला साक्षात् शिव हो जाता है, जैसा कि विज्ञानभैरव के निम्न श्लोक में कहा गया है— १. 'वाङ्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. निरुपद्रवम्-ग. उ. । ३. 'नाम' नास्ति-ख. ज. झ. । ४. तदूर्ध्वं लवोर्ध्वं-क. ने. ज. । ५. विधविश्व-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. पृ० १५ की टिप्पणी देखिये ।