योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः चतुष्षष्टिस्तदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः । शक्त्यादीनां तु मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥३४॥ मनोन्मन्या२ मनोन्मनीपर्यन्तम् । मनोन्मनी नाम समना, मनःसहितत्वात्, तद्रहितत्वादुन्मनीत्युच्यते । शक्त्यादीनां ३मनोन्मनीपर्यन्तानामंशानां वपुः स्वरूपं स्फूर्जद्द्वादशादित्यसंनिभम् एकत्र हेलयोदितद्वादशादित्यसवर्णवर्णम् । मात्रांश- श्चतुष्षष्टिः मात्रांशकालश्चतुष्षष्टितमोंऽश इत्यर्थः । तदूर्ध्वं तु१ व्यापिकाया मात्रांशो- च्चारणं द्विगुणं व्यापिकोच्चारणमात्रावयवकालोऽष्टाविंशत्युत्तरशततमो भाग इत्यर्थः । ततः४ समनोच्चारणमात्रावयवकालः षडधिकपञ्चाशदुत्तरद्विशततमो भाग इत्यर्थः । उन्मनी यथेदानीं५ कथितविशेषणा तथा निराकारा निरुच्चारा, “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै० उ० २।४) इत्युपनिषदुकरीत्या अंशों का उच्चारण काल दुगुना सूक्ष्म होता जाता है । उन्मनी का न तो कोई आकार होता है और न इसका उच्चारण ही संभव है ॥३३-३४॥ 'मनोन्मन्याः' पद का अर्थ मनोन्मनी पर्यन्त किया जाता है । मनोन्मनी शब्द से यहाँ समना गृहीत है, क्योंकि मन की स्थिति यहीं तक है । उन्मनी में मन की स्थिति नहीं रहती । शक्ति से लेकर मनोन्मनी (समना) पर्यन्त अंशों का स्वरूप एक स्थान पर एका- एक उगे १२ आदित्यों (सूर्यों) की कान्ति के समान है । १शक्ति का उच्चारण काल मात्रा का ६४ वाँ भाग है । इसके ऊपर व्यापिका का उच्चारण काल इससे दुगुना, अर्थात् मात्रा का १२८ वाँ भाग होगा । इसके बाद की समना का उच्चारण काल मात्रा का २५६ वाँ भाग होगा । १उन्मना को निराकार और निरुच्चार कहा गया है, अर्थात् इसका न तो कोई आकार है और न इसका उच्चारण ही किया जा सकता है । तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है-“मन के साथ वाणी भी यहाँ तक आकर लौट जाती है, क्योंकि उनकी यहाँ तक पहुँच नहीं है ।” इस तरह से वाणी और मन की गति यहाँ १. व्यापिका-ग. उ. । २. 'मनोन्मन्याः' नास्ति-ग, उ. । ३. उन्मनी-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. 'ततः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. दानीम-झ. उ. ।
- प्रस्तुत प्रकरण की व्याख्या करते समय तथा वरिवस्यारहस्य (पृ० १३-१४) में भी भास्करराय ने समना के समान उन्मना का भी उच्चारण काल मात्रा का २५६ वाँ भाग माना है । भास्करराय वरिवस्यारहस्य (पृ० १३-१४) में एक अन्य मत का उल्लेख करते हैं । तदनुसार उन्मना का उच्चारण काल मात्रा का ५१२ वाँ भाग है । श्रद्धेय कविराज जी भी अपने 'तान्त्रिक वाङ् मय में शाक्त दृष्टि' नामक ग्रन्थ में 'नादतत्त्व' शीर्षक के अन्तर्गत (पृ० ३०८) इस पक्ष की चर्चा करते हैं ।