योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४९ १सृष्टिं स्थितिं च संहारं तिरोभावमनुग्रहम् । शिवः करोति सततं सर्वकारणकारणम् ॥ शिवः सर्वस्य कर्तेयं शक्तिः कारणमिष्यते । एकस्मादेव बिन्दोर्विलसद्दृजुरेखारूपा उन्मना । उन्मनायाः प्रपञ्चः स्वच्छन्द- संग्रहे यथा— या शक्तिः कारणत्वेन तदूर्ध्वे २उन्मना ३स्मृता । ४मनः संक्रमते यत्र तेन सा उन्मना स्मृता ॥ नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता । सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते ॥ शिवशक्तिरिति ख्यातं५ निर्विकल्पं निरञ्जनम् । इति ॥३२॥ शक्त्यादीनां समनान्तानां वर्णं मात्रांश६कालं चाह— शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्द्वादशादित्यसंनिभम् ॥३३॥ पोषण करती है। इस समना शक्ति के सहारे ही परम कारण भगवान् शिव सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह नामक पाँच कृत्यों का निरन्तर संपादन करते रहते हैं और इस तरह से वे भी सभी कारणों के कारण कहलाते हैं। यहाँ शिव सबके कर्ता और शक्ति सबकी कारणस्वरूप है । एक ही बिन्दु के ऊपर शोभित हो रही सीधी रेखा से उन्मना का आकार बनता है । इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में किया गया है— अभी जिस समना नाम की कारण शक्ति का वर्णन किया गया है, उसके ऊपर उन्मना शक्ति स्थित है। यहाँ आकर मन लीन हो जाता है, इसलिये इसका नाम उन्मना है। यहाँ मन के लीन हो जाने से काल की कला की, किसी तत्त्व या देवता की भी प्रतीति नहीं होने पाती । परमशुद्ध सच्चे निर्वाण की यही स्थिति मानी जाती है । इसी को ७रुद्रवक्त्र कहते हैं। यह शिव की निर्विकल्प निरंजन शक्ति के नाम से प्रसिद्ध है ॥३२॥ अब शक्ति प्रभृति के वर्ण और मात्राकाल का वर्णन किया जाता है— शक्ति प्रभृति का स्वरूप एक साथ उगे १२ आदित्यों के समान है। शक्ति का उच्चारण काल मात्रा का ६४ वाँ भाग है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त १. सृष्टिमिति श्लोको नास्ति–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. उन्मनी–ख. ग. ने. ज. झ. उ । ३. स्थिता–ने., मता–उग. । ४. नास्त्येषा पङ्क्तिः–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. तां···कारा···ञ्जना–क. ख. । ६. मात्रांशकत्वं–उ., मात्रांत्वं कलां–ख. । ७. विज्ञानभैरव (श्लोक २४) में रुद्रवक्त्र सौबीजक के नाम से वर्णित है। ४