योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः पञ्चवक्त्रा त्रिनेत्रा च सुतेजस्का च पञ्चमी। शक्तितत्त्वं समाख्यातं ध्यानान्मुक्तिफलप्रदम् ॥इति। व्यापिका बिन्दोर्विलासाद् १वामादित्रिशक्तिमया त्रिकोणरूपतां गतेत्यर्थः। इयं तु शक्तितत्त्वकथनेनैव कथिता स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—२“सूक्ष्मा चैव” इत्यादि “स्थिताः” इत्यन्तं पूर्वोक्तम् ॥३१॥ बिन्दुद्वयान्तरालस्था ३ऋजुरेखामयी पुनः ॥३२॥ समना बिन्दुविलसदृजुरेखा तथोन्मना। स्पष्टम्। समनायाः प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे४— चिदानन्दस्वरूपा तु पराशक्तिस्तदूर्ध्वतः। समना नाम सा शक्तिः सर्वकारणकारणम् ॥ सर्वाण्डानि५ बिभर्तीयं शिवेन समधिष्ठिता। अत्रारूढः स भगवान् शिवः परमकारणम् ॥ अत्यन्त तेजस्विनी है, पांच मुँह और तीन नेत्र वाली है। यह शक्तितत्त्व ध्यान मात्र से मुक्ति का प्रदाता है ॥ व्यापिका बिन्दु के विलास से वामा प्रभृति तीन शक्तियों से संवलित त्रिकोण का आकार धारण कर लेती है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका वर्णन शक्ति तत्त्व के अन्तर्गत ही किया गया है। “सूक्ष्मा चैव” से लेकर “स्थिताः” पर्यन्त श्लोकों को अभी-अभी ऊपर के अनुच्छेद में उद्धृत किया जा चुका है ॥३१॥ ऊपर और नीचे विद्यमान दो बिन्दुओं के बीच में स्थित सीधी रेखा से समना का और एक बिन्दु के ऊपर शोभित सीधी रेखा से उन्मना का आकार बनता है ॥३२॥ इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है। स्वच्छन्दसंग्रह में समना का परिचय इस तरह से दिया गया है— इस व्यापिनी शक्ति के ऊपर चिदानन्दस्वरूपिणी परा शक्ति विद्यमान है। यह समना नाम की शक्ति सभी कारण पदार्थों की भी कारण है, अर्थात् सारे कारण पदार्थों की सृष्टि इसी से होती है। शिव के द्वारा समधिष्ठित यह शक्ति ही सभी अण्डों का भरण- १. 'वामादि' नास्ति-ग. च. उ.। २. सम्पूर्णः श्लोकः पुनरप्यत्र-ख. ग. ने. ज. उ. । ३. लस्थऋ-ख. ग. च. छ. ज. झ. उ. । ४. भैरवे यथा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. सर्वान्तानि-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।