भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४७ ब्रह्माणी त्वपरा शक्तिर्ब्रह्मणोत्सङ्गगामिनी । द्वारं सा मोक्षमार्गस्य रोधयित्वा व्यवस्थिता ॥ इति ॥ ३० ॥ शक्तिर्वामस्थबिन्दूत्थस्थिरेराकारा तथा पुनः ॥ ३१ ॥ व्यापिका बिन्दुविलसत्त्रिकोणाकारतां गता । पुनःशब्देन पूर्वेभ्यो विशेषो द्योत्यते । पूर्वेषां बिन्द्वाद्यंशानां स्वरूपवर्णमात्रा- कालांशा२ अभिकल्पिताः । शक्तिमारभ्य समनान्तानामंशानां स्वरूपवर्णमात्रा३- कालाः पश्चाद् वक्ष्यन्त इत्यर्थः । शक्तिर्बिन्दुद्वयमध्ये वामभागस्थबिन्दूत्थ४स्थिरा- कारा । शक्तिप्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा— शक्तितत्त्वं समाख्यातं भुवनै५रावृतं महत् । आधारं भुवनानां च प्रवक्ष्यामि समासतः ॥ सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवामृता मृता । चतुर्दिक्षु स्थितास्तासां मध्यस्था व्यापिनी ६स्मृता ॥ कान्ति है । ये दश भुजा वाले, तीन नेत्र वाले, पांच मुंह वाले और इन्दुशेखर हैं । इनकी गोद में ब्रह्माणी नाम की शक्ति विराजमान है । यह शक्ति मोक्ष के मार्ग को रोक कर बैठी रहती है ॥ ३० ॥ शक्ति का आकार सीधी रेखा के वाम भाग में बिन्दु को रखने से बनता है । व्यापिका का आकार त्रिकोणमय है । इस त्रिकोण के नीचे एक बिन्दु शोभित है ॥ ३१ ॥ श्लोक में विद्यमान पुनः शब्द एक विशेषता का द्योतक है । पूर्व वर्णित बिन्दु प्रभृति का स्वरूप, वर्ण और मात्राकाल भी साथ में ही बताया गया है । अब शक्ति से लेकर समना पर्यन्त अंशों का १स्वरूप, वर्ण और मात्राकाल बाद में बताया जायगा । दो बिन्दुओं में से वाम भाग में स्थित बिन्दु से एक स्थिर रेखा खींच देने पर शक्ति का आकार बनता है । स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— शक्तितत्त्व अनेक महान् भुवनों से आवृत है । यही सारे भुवनों का आधार है । इसका मैं संक्षेप में वर्णन करूँगा । चार दिशाओं में स्थित सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता और मृता नाम की चार शक्तियों के बीच में व्यापिनी विराजमान है । यह पांचवीं शक्ति १. शिवा—ग. ने. छ. झ. उ., शिवाकारतया—ने. ज. । २. कलांशाः कल्पिताः—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. कलाः—क. ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. शिवा—ज. झ. उ. । ५. राश्रितम्—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. स्थिता—ख. ग. । १. बिन्दु से उन्मना पर्यन्त कलाओं के स्वरूप को जानने के लिये भास्करराय के वरिवस्यारहस्य के अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास से प्रकाशित संस्करण के अन्त में दिया गया चित्र देखना चाहिये ।