भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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४६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः पद्ममध्ये समासीनमीश्वरं चोर्ध्वगामिनम् । चन्द्रायुतप्रतीकाशं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥ १इन्धिकाद्यैर्वृतं देवं शूलपाणिं जटाधरम् । तस्योत्सङ्गगतामूर्ध्वगामिनीं परमां शिवाम् ॥ ध्यायेत् ॥इति। विद्युदुज्ज्वलः तडित्सदृशकान्तिः । हलाकारः लाङ्गलसदृशरूपः । सव्यस्थ- बिन्दुयुक्तः बिन्दुद्वयमध्ये दक्षिणभागस्थितबिन्दुयुक्तः । द्विगुणांशश्च पूर्वोक्तषोड- शांशानां द्विगुणांशो द्वात्रिंशत्तमो भागः । कोऽर्थः ? मात्राद्वात्रिंशत्तमांशोच्चारण- कालो हलाकारादिविशेषणविशेषितो नादान्त इत्यर्थः । नादस्यान्तो लयो भवति यत्र ब्रह्मारन्ध्रे, तस्य प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा— हलाकारस्तु नादान्तो भित्त्वा सर्वमिदं जगत् । अधःशक्त्या विनिर्भिद्य ऊर्ध्वशक्त्यवसानकः ॥ नाड्यां ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिलक्षणः । अतो ब्रह्मबिलं ज्ञेयं रुद्रकोट्यर्बुदैर्युतम्२ ॥ तत्र ३ब्रह्मशिवो ज्ञेयः शशाङ्कशसन्निभः । दशबाहुस्त्रिनेत्रश्च पञ्चवक्त्रेन्दुशेखरः ॥ चन्द्रों की समान कान्ति वाले, पांच मुँह और तीन नेत्र वाले, त्रिशूल हाथ में लिये जटाजूट- धारी ऊर्ध्वगामी भगवान् शिव का और उनके उत्संग ( गोद ) में बैठी ऊर्ध्वगामिनी भगवती भवानी का ध्यान करना चाहिए ॥ नादान्त बिजली के समान चमक वाला और हल के समान आकार वाला है । दो बिन्दुओं में से एक बिन्दु इसकी दक्षिण की ओर रहता है । इसका उच्चारण काल सोलह का दुगुना, अर्थात् मात्रा का ३२ वां भाग होता है। इसका अभिप्राय यह है कि नादान्त का उच्चारण काल मात्रा का ३२ वां भाग है और इसका आकार हलाकार आदि विशे- षताओं से युक्त है । नादान्त का स्थान ब्रह्मारन्ध्र में है, क्योंकि यहीं नाद का अन्त (लय) होता है । स्वच्छन्दसंग्रह में नादान्त का प्रपंच ( विस्तृत वर्णन ) इस तरह से किया गया है— नादान्त का आकार हल के सदृश है, अतः इस सारे जगत् को भेद कर, अधःशक्ति से लेकर ऊर्ध्वशक्ति पर्यन्त समस्त शक्ति चक्रों को भी भेद कर ब्रह्मबिल ( ब्रह्मरन्ध्र ) में स्थित नाडी ( सुषुम्ना ) में लीन हो जाता है । उस समय अव्यक्त मधुर ध्वनि के रूप में मात्र योगीजन इसका अनुभव कर सकते हैं । यह ब्रह्मबिल ११ करोड़ अरब योजन विस्तार वाला है । यहां ब्रह्म रूपी शिव निवास करते हैं । सैंकड़ों चन्द्रों के सदृश इनकी १. इन्धिका-ग. ज. ङ. । २. र्वृतम्-क. ग. । ३. ब्रह्म-ग. ङ. ज. ।