भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४५ हलाकारस्तु सव्यस्थबिन्दुयुक्तो विराजते । बिन्दुद्वयमध्यगत ऋजुरेखाकारः शेवरूपः, मुष्कद्वयमध्यगता शिरा शेव इत्यु- च्यते, तत्तुल्यरूपः । मणिप्रभः पद्मरागसवर्णवर्णः । कलांशः, कलाः षोडशमात्राः, षोडशांशोच्चारणकाल इत्यर्थः । स पुनः कलांशो नादस्तन्त्रेणोच्यते । “१‘कलो नादस्तु गम्भीरे ध्वनौ तु मधुरास्फुटे” इत्यमरः । मधुरास्फुटो ध्वनिर्नादः । नाद- प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा— रोधिन्याख्यं यदुक्तं ते नादस्तस्योर्ध्वसंस्थितः । पद्मकिञ्जल्कसंकाशः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥ पुरैः परिवृतोऽसंख्यैर्मध्ये पञ्चकलावृतः । इन्धिका दीपिका चैव २रोचिका मोचिका तथा ॥ ऊर्ध्वगा मध्यगा तासां पञ्चमो परमा कला । चन्द्रकोटिसमप्रख्यं तन्मध्येऽर्बुदयोजनम् ॥ मात्रा का सोलहवां भाग है। नादान्त का उच्चारण काल मात्रा का ३२ वां भाग है। यह बिजली के समान चमकीला है और इसका आकार हल के सदृश है। इसके दक्षिण भाग में एक बिन्दु भी बना रहता है ॥ ३० ॥ दो बिन्दुओं के बीच में एक सीधी रेखा खींच देने पर उसका आकार शेव के समान हो जाता है। दो अण्डकोशों के बीच की सीवन को शेव कहते हैं। नाद की आकृति ऐसी ही होती है। पद्मराग मणि के समान इसकी कान्ति है। मात्रा का कलांश अर्थात् सोलहवां भाग इस कलांश (नाद) का उच्चारण काल है। कलांश पद की दो बार आवृत्ति करने से यह अर्थ निकलता है। ‘कलो नादस्तु’ इत्यादि अमरकोश के वचन के अनुसार मधुर और अस्फुट ध्वनि को नाद कहते हैं। इस नाद का परिचय भी स्वच्छन्दसंग्रह में दिया गया है— अभी तुम्हें रोधिनी का स्वरूप समझाया है। इसके ऊपर नाद की स्थिति है। पद्म की केसर के समान इसका वर्ण और करोड़ों सूर्यों के समान इसकी कान्ति है। यह असंख्य भुवनों से आवृत है और उन सबके बीच में पांच कलाएं हैं। इनके नाम इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका और ऊर्ध्वगा हैं। पांचवीं सर्वश्रेष्ठ कला मध्यभाग में विराजमान है। इन सब इन्धिका प्रभृति देवियों से घिरे हुए करोड़ों चन्द्र की समान कान्ति वाले एक अर्बुद (अरब) योजन विस्तार वाले इस पद्म के बीच में बैठे हुए, अरबों १. ‘कलो नादो ध्वनौ तु मधुरास्फुटे कलः—ख. ग. ज. झ. उ., ‘ध्वनौ तु मधुरास्फुटे। 'कलो नादस्तु गम्भीरे' (१।६।२२) इति तु मूलस्य पाठः । २. रेचिका—क. ख. नै.

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