योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अर्धचन्द्रः बिन्दोरर्धभागः, तथाकारः दीपाकार एव। पादमात्रः मात्राकालस्य चतुर्थभागोच्चारणकाल इत्यर्थः। तदूर्ध्वके बिन्दोरूर्ध्वभागे। बिन्दूपरिदेशे पाद- मात्रोच्चारणकालो दीपाकारोऽर्धचन्द्र इत्यर्थः। ज्योत्स्नाकारा चन्द्रिकासमकान्तिः, १तदष्टांशा मात्राष्टांशोच्चारणकाला, त्र्यस्रविग्रहा त्रिकोणाकारा रोधिनी। द्वयोरपि स्वच्छन्दसंग्रहे प्रपञ्चो यथा— अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वे तु रोधिनी तस्य चोपरि। ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती कान्तिः सुप्रभा विमलापि च॥ अर्धचन्द्र२स्थिता ह्येताः कलाः पञ्च प्रकीर्तिताः। रुन्धिनी रोधिनी रोधा ज्ञानरोधा तमोपहा॥ निरोधिकाकलाः पञ्च कथितास्तव सुन्दरि। ब्रह्मादिपरमेशानां परप्राप्तिनिरोधनात्॥ निरोधिकेति सा प्रोक्ता तस्या भेदाद् वरानने। परसादाख्यसम्प्राप्तिः .... .... ॥इति॥२९॥ बिन्दुद्वयान्तरे दण्डः शेवरूपो मणिप्रभः। कलांशो द्विगुणांशश्च नादान्तो विद्युदुज्ज्वलः॥३०॥ अर्धचन्द्र बिन्दु के आधे भाग से बनता है। यह भी दीपक के समान प्रकाशमय आकृति वाला है। पादमात्र का अर्थ यह है कि इसके उच्चारण में एक मात्रा का चौथा भाग समय लगता है। बिन्दु के ऊपर यह स्थित है। बिन्दु के ऊपर के भाग में स्थित, चौथाई मात्रा उच्चारण काल वाला और दीपक के समान उज्ज्वल कान्ति वाला अर्धचन्द्र कहलाता है। रोधिनी चन्द्रिका के समान कान्ति वाली और त्रिकोण सदृश आकृति वाली है। इसका उच्चारण काल मात्रा काल का आठवां भाग है। अर्धचन्द्र और रोधिनी का स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से विस्तार किया गया है — बिन्दु के ऊपर अर्धचन्द्र और अर्धचन्द्र के ऊपर रोधिनी स्थित है। ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती, कान्ति, सुप्रभा और विमला नाम की पांच कलाएँ निरोधिका में स्थित हैं। हे सुन्दरि ! यह सब मैंने तुमको सुनाया है। यह निरोधिका इस लिये कहलाती है कि ब्रह्मा प्रभृति श्रेष्ठ देवताओं को भी यह परतत्त्व तक पहुँचने से रोक देती है। इस निरोधिका शक्ति का भेदन करने के उपरान्त ही परसादाख्य तत्त्व की प्राप्ति होती है॥ २९॥ दो बिन्दुओं के बीच में एक सीधी रेखा—यही नाद का आकार है। शेव- सदृश इस नाद की कान्ति मणि के समान उज्ज्वल है। इसका उच्चारण काल १. अष्टांशा-ख. ने. ज. झ., अष्टांशः अष्टांशोच्चारणकालः-ग.। २. न्द्रोदिता-ख., न्द्रोत्थिता-क., न्द्रस्थिता-ग. ङ.।