भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४३ च्चारणकालो वृत्तसंनिवेशो बिन्दुरित्यर्थः । बिन्द्रादीनां तु विस्तारः स्वच्छन्दसंग्रहे प्रपञ्चितः । तत्र बिन्दोर्यथा— बिन्द्रावरणमूर्ध्वतः । सूर्यकोटिप्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ॥ तन्मध्ये दशकोटीनां संख्यायोजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ॥ पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभाकृतिः । निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिरनुक्रमात् ॥ परिवार्य स्थिताश्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना शान्त्यतीता मनोन्मनी ॥ पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दशबाह्विन्दुभूषणाः । बिन्दुतत्त्वं समाख्यातं कोट्यर्बुदशतैर्वृतम् ॥इति ॥२८॥ अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके । ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९॥ इसके उच्चारण में मात्रा के उच्चारण का आधा समय लगता है और इसकी स्थिति ललाट में है । स्वच्छन्दसंग्रह में बिन्दु प्रभृति का विस्तार से वर्णन किया गया है । वहाँ बिन्दु का वर्णन इस तरह से किया गया है— इसके ऊपर बिन्दु का आवरण है । यह करोड़ों सूर्यों के समान अत्यन्त उज्ज्वल बहुत बड़ा स्थान है । इसके बीच में दस करोड़ योजन विस्तार वाला पंकज है । इस पद्म की कर्णिका में भगवान् शान्त्यतीतेश्वर विराजमान हैं । इनके पाँच मुँह और दस भुजाएँ हैं । इनका स्वरूप विद्युत्पुंज के समान है । निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति नाम की चार शक्तियाँ इनको घेर कर बैठी हुई हैं और इनके वामभाग में मन की अगोचर शान्त्यतीता शक्ति विराजमान है । ये सभी शक्तियाँ पाँच मुँह और दस भुजाओं वाली हैं और इनके ललाट पर चन्द्रकला शोभित है । इस तरह से करोड़ों-अरबों योजन विस्तार वाला यह बिन्दु नाम का आवरण स्थित है । इसी को बिन्दु तत्त्व कहा जाता है ॥२८॥ अर्धचन्द्र भी दीपक के समान उज्ज्वल आकृति वाला है । मात्रा का चौथा भाग इसके उच्चारण का काल है । बिन्दु के ऊपर इसका स्थान है । रोधिनी का आकार त्रिकोणमय है और चांदनी के समान चमकता है । इसका उच्चारण काल मात्रा का आठवां भाग है ॥ २९ ॥