योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४३ च्चारणकालो वृत्तसंनिवेशो बिन्दुरित्यर्थः । बिन्द्रादीनां तु विस्तारः स्वच्छन्दसंग्रहे प्रपञ्चितः । तत्र बिन्दोर्यथा— बिन्द्रावरणमूर्ध्वतः । सूर्यकोटिप्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ॥ तन्मध्ये दशकोटीनां संख्यायोजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ॥ पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभाकृतिः । निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिरनुक्रमात् ॥ परिवार्य स्थिताश्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना शान्त्यतीता मनोन्मनी ॥ पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दशबाह्विन्दुभूषणाः । बिन्दुतत्त्वं समाख्यातं कोट्यर्बुदशतैर्वृतम् ॥इति ॥२८॥ अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके । ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९॥ इसके उच्चारण में मात्रा के उच्चारण का आधा समय लगता है और इसकी स्थिति ललाट में है । स्वच्छन्दसंग्रह में बिन्दु प्रभृति का विस्तार से वर्णन किया गया है । वहाँ बिन्दु का वर्णन इस तरह से किया गया है— इसके ऊपर बिन्दु का आवरण है । यह करोड़ों सूर्यों के समान अत्यन्त उज्ज्वल बहुत बड़ा स्थान है । इसके बीच में दस करोड़ योजन विस्तार वाला पंकज है । इस पद्म की कर्णिका में भगवान् शान्त्यतीतेश्वर विराजमान हैं । इनके पाँच मुँह और दस भुजाएँ हैं । इनका स्वरूप विद्युत्पुंज के समान है । निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति नाम की चार शक्तियाँ इनको घेर कर बैठी हुई हैं और इनके वामभाग में मन की अगोचर शान्त्यतीता शक्ति विराजमान है । ये सभी शक्तियाँ पाँच मुँह और दस भुजाओं वाली हैं और इनके ललाट पर चन्द्रकला शोभित है । इस तरह से करोड़ों-अरबों योजन विस्तार वाला यह बिन्दु नाम का आवरण स्थित है । इसी को बिन्दु तत्त्व कहा जाता है ॥२८॥ अर्धचन्द्र भी दीपक के समान उज्ज्वल आकृति वाला है । मात्रा का चौथा भाग इसके उच्चारण का काल है । बिन्दु के ऊपर इसका स्थान है । रोधिनी का आकार त्रिकोणमय है और चांदनी के समान चमकता है । इसका उच्चारण काल मात्रा का आठवां भाग है ॥ २९ ॥