योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः भावयेत् । तद्भावनं सकलनिष्कलम् । १परे स्थाने महाबिन्दौ शुद्धशून्यसंविदं भाव- येत् । तद्भावनं निष्कलम् । २एवं त्रिधा स्थितम् । अकुलाद्याज्ञान्तास्तन्त्रान्तरेषु विस्तरेणोक्ताः, अतो नात्रोक्ताः ॥२७॥ बैन्दवाद्युन्मन्यन्तानां स्वरूप३मुच्चारणकालं स्थानं चाह "दीपाकारः" इत्या- दिना "मनोन्मनी" इत्यन्तेन (श्लो० २८-३४)— दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ॥२८॥ दीपाकारः, दीपस्य यादृशं भासनं तादृशमस्येत्यर्थः । अर्धमात्रः । ह्रस्वस्यो- च्चारणकालो मात्रेत्युच्यते । मात्राया अर्धमुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः । ललाटे वृत्त इष्यते । वर्त्तुलसंनिवेशो ललाटे भ्रुवोरुपरिभागे । दीपाकारोऽर्धमात्रो- लेकर उन्मना पर्यन्त स्थानों में चक्र के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर भागों की भावना करनी चाहिये । यह भावना सकल-निष्कल कहलाती है । परम स्थान महाबिन्दु में शुद्ध शून्य संवित्ति की भावना करनी चाहिये । इस भावना को निष्कल कहते हैं । इस तरह से इन तीन भावनाओं के आधार पर चक्र की त्रिविध स्थिति मानी जाती है । अकुल से आज्ञा पर्यन्त चक्रों का अन्य तन्त्रों में १विस्तार से वर्णन मिलता है, अतः यहाँ (योगिनीहृदय में) उनका वर्णन नहीं किया गया है ॥२७॥ अब बिन्दु से उन्मना पर्यन्त नाद कलाओं का स्वरूप, उच्चारण काल तथा स्थान का वर्णन २८ से ३४ पर्यन्त श्लोकों में किया जा रहा है— बिन्दु का स्वरूप दीपक सदृश भासमान वृत्ताकार है । उच्चारण का काल अर्धमात्रा और स्थान इसका ललाट है ॥२८॥ दीपाकार का अर्थ है दीपक के सदृश भासमान । ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसको मात्रा कहते हैं । इस बिन्दु के उच्चारण का काल उसका आधा है । दोनों भौंहों के ऊपर ललाट के बीच में गोल आकार वाला यह बिन्दु स्थित है । इसका आशय यह हुआ कि यह बिन्दु दीपक के सदृश उज्ज्वल तथा गोल आकार वाला है, १. तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा वाक् शून्यसंविदुत्पत्त्यवस्था सूक्ष्मा मूलाधारात् प्रथममुदिते परापरे स्थाने—ग. ज. झ. उ. । २. 'एवं' नास्ति—ख. ग. । ३. मुच्चारकालं चाह—ख. ग. घ. उ. ।
- योगिनीहृदयदीपिका में उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचनों में यह विषय विस्तार से वर्णित है । दीपिकाकार ने योगिनीहृदय वर्णित नौ चक्रों से संबद्ध वचन ही प्रायः उद्धृत किये हैं । दीपिका में उद्धृत उक्त ग्रन्थ के उद्धरणों के अनुसार उसमें कुल और अकुल नामक दो सहस्रदल कमलों के बीच में ३० आधार पद्मों का वर्णन किया गया है । यह वर्णन अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । यह महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ आज अनुपलब्ध है । इसकी खोज होनी चाहिये ।