भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४१ बिन्द्वाद्युन्मन्यन्ता भागाः सूक्ष्माः सूक्ष्मतराः स्वदेहचक्रविद्यानां साधारणाः । १कोऽर्थः ? अत्र त्रैलोक्यमोहना२दिबिन्द्वन्तान् स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरान् चक्रभागान्- कुलाद्युन्मन्यन्तेषु स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरेषु भागेषु महाबिन्दौ च विभावये- दित्यर्थः ॥२५-२६॥ पुनरपि त्रैविध्यमाह— पुनश्चैवं त्रिधा चक्रं तु भावयेत् । एवमुक्तप्रकारेण विभावितं चक्रं पुनस्त्रिधा ३भावयेत् । त्रैविध्यमाह— आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तं ततः सकलनिष्कलम् ॥२७॥ उन्मन्यन्तं परे स्थाने निष्कलं च त्रिधा स्थितम् । आज्ञान्तम् अकुलाद्याज्ञापर्यन्तं चतुरस्रादित्रिकोणान्तं चक्राष्टकं स्थूलं भाव- येत् । तद्भावनं सकलम् । ततो बिन्दुमारभ्य उन्मन्यन्तं ४चक्रसूक्ष्मसूक्ष्मतरभागान् जायगा । महाबिन्दु से देश, काल और रूप से रहित परसादाख्य तत्त्व का ग्रहण होता है । बिन्दु से लेकर उन्मना पर्यन्त भाग सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते जाते हैं और इनकी स्थिति साधक के शरीर में, श्रीचक्र में और श्रीविद्या में भी एक जैसी है। इसका अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन चक्र से लेकर बिन्दु पर्यन्त चक्रों के स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर भागों की अकुल से लेकर उन्मनी पर्यन्त सूक्ष्म और सूक्ष्मतर भागों में तथा महाबिन्दु में भावना करनी चाहिये ॥२५-२६॥ इस चक्र की पुनः त्रिविध भावना का उपदेश करते हैं— इस चक्र की पुनः त्रिविध भावना करनी चाहिये । उक्त (१।२५-२६) प्रकार से विभावित चक्र को पुनः तीन तरह से भावना करनी चाहिये । इस त्रिविधता का ही वर्णन आगे किया जाता है— आज्ञा पर्यन्त चक्र की सकल रूप में, उन्मनी पर्यन्त चक्र की सकल-निष्कल रूप में और परस्थान (महाबिन्दु) की निष्कल रूप में, इस तरह से इस श्रीचक्र की पुनः त्रिविध भावना करनी चाहिये ॥२७॥ अकुल से आज्ञा पर्यन्त १आठ स्थानों में चतुरस्र से त्रिकोण पर्यन्त आठ चक्रों की स्थूल रूप में भावना करनी चाहिये । इसको सकल उपासना कहते हैं । तब बिन्दु से १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. घ. ज. झ. उ. । २. नाद्युन्मन्यन्तान्—ख. ग. ने. ज. डा. उ. । ३. विभाव-क. झ. उ. । ४. सूक्ष्मसूक्ष्मतरचक्रभागान्-क. ग. । १. पृ० ३६ की टिप्पणी २ देखिये । तदनुसार अकुल से आज्ञा पर्यन्त नौ चक्रों में चतुरस्र से बिन्दु पर्यन्त नौ चक्रों की भावना करनी चाहिये ।