योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः लम्बिकाग्रे अष्टदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— कण्ठोर्ध्वं परमेशानि लम्बिका चतुरङ्गुले। तस्यामष्टदलं पद्मं १वशिन्यादिभिरावृतम्॥ इति। भ्रुवोऽन्तरे आज्ञायां द्विदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— आज्ञाधारं द्विपत्राब्जं हक्षद्विदलसंयुतम्। हंसवतीक्षमापार्श्वं२ तयोर्मध्ये तु हाकिनी॥ इति। भ्रुव इत्येकवचनं भ्रूद्वयोपलक्षणम्। भ्रुवोरन्तर इत्यर्थः। इन्दौ बिन्दौ। बिन्दुत्तदर्धरोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनीनामुपर्य्युपरि रूपाण्युच्चा- रणकालं च वक्ष्यति। ३महाबिन्दौ परसादाख्ये४ देशकालरूपवर्जिते५। डाकिनी देवी और बाह्य दलों में हे परमेश्वरि! सोलह स्वरों की अधिष्ठात्री १अमृता आदि शक्तियाँ विराजमान हैं। इन सबके ऊपर चन्द्रबिम्ब है॥ लम्बिकाग्र शब्द से अष्टदल कमल का ग्रहण होता है। इसका भी वर्णन वहाँ इस तरह से मिलता है— हे परमेशानि! कण्ठ से चार अंगुल ऊपर लम्बिका स्थित है। इसमें २वशिनी आदि- देवियों से आवृत अष्टदल पद्म है॥ 'भ्रुवोऽन्तरे' शब्द का अर्थ दो दल वाला आज्ञा चक्र है। इसका भी वर्णन वहीं किया गया है— आज्ञाधार अर्थात् आज्ञा चक्र दो दल वाला है। ये दोनों दल ह और क्ष अक्षरों से सुशोभित हैं। इस चक्र में हाकिनी देवी का निवास है तथा हंसवती और क्षमा३ नामक शक्तियाँ इसके दोनों तरफ विद्यमान हैं॥ 'भ्रुवोऽन्तरे' यहाँ एकवचन होते हुए भी वह द्विवचन का बोध कराता है। वास्तव में 'भ्रुवोरन्तरे' ऐसा पाठ होना चाहिए। यहाँ छन्द की दृष्टि से 'भ्रुवोऽन्तरे' यह पाठ कर दिया गया है। इन्दु शब्द से बिन्दु का ग्रहण होता है। बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना की एक से दूसरे के ऊपर स्थिति, स्वरूप और उनके उच्चारण का काल अभी आगे (१।२८-३४) बताया १. वशिका-ने. ज. उ.। २. पार्श्वद्वयं-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'महाबिन्दौ' नास्ति- घ. ने. ज. उ.। ४. सादाख्यो-ख. ज.। ५. विवर्जितः-ख. ने. ज. उ.। १. सोलह स्वरों की अधिष्ठात्री अमृता आदि सोलह शक्तियों के नाम स्वच्छन्द- संग्रह के प्रमाण से योगिनीहृदयदीपिका (३।३४) में देखे जा सकते हैं। अनङ्गा आदि आठ देवियों को छोड़कर वरदा आदि देवियों के नाम भी यहाँ स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन के प्रमाण पर ही दिये गये हैं। २. नित्याषाडशिकार्णव (१।७७-७९) में वर्णित वशिनी आदि आठ देवियों का यहाँ स्मरण किया गया लगता है। ये नाम यहाँ दीपिका (३।६३) में भी देखे जा सकते हैं। दीपिका (३।२९) के उक्त उद्धरण में इन देवियों के भी नाम हैं।