योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 89, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९ नाभौ १दशदलकमले मणिपूरके। तदुक्तं तत्रैव— नाभि२स्त्र्यर्धाङ्गुलोपरि। तत्पद्मं मणिपूरं च दशपत्रं सुशोभनम्३ ॥ लाकिनीमध्यगं तच्च डामर्यादिभिरावृतम्। इति। अनाहते हृदयस्थाने द्वादशदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— चतुर्दशाङ्गुलादूर्ध्वं४ मणिपूराख्यपङ्कजात्। पङ्कजं राकिनीमध्यं द्वादशारमनाहतम्॥ तत्रस्थकालरात्र्यादिशक्तिभिश्च समावृतम्। तत्रस्थसूर्यबिम्बं५ तु ६नादोड्ड्यानाख्यपीठकम्॥ इति। शुद्धे कण्ठस्थितषोडशदलकमले। तदुक्तं तत्रैव— तस्मादेकाङ्गुलादूर्ध्वं विशुद्धं षोडशारकम्। मध्यगा डाकिनी बाह्यपत्रेषु परमेश्वरि७ ॥ अमृताद्यक्षरान्त८स्थाश्चन्द्रबिम्बं तदूर्ध्वतः। इति। नाभि शब्द से दस दल वाले मणिपूर चक्र का ग्रहण होता है। इस चक्र का भी स्वच्छन्दसंग्रह में ही इस तरह से वर्णन है— स्वाधिष्ठान चक्र से साढ़े तीन अंगुल ऊपर नाभिपद्म है। दस दल वाला यह सुन्दर पद्म मणिपूर कहलाता है। इसमें १डामरी प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई लाकिनी देवी का ध्यान किया जाता है॥ बारह दल वाला हृदय स्थित कमल अनाहत कहलाता है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका भी वर्णन किया गया है— मणिपूर पंकज से १४ अंगुल ऊपर विद्यमान द्वादश दल कमल अनाहत कहलाता है। इसमें २कालरात्रि आदि शक्तियों से घिरी हुई राकिनी देवी का ध्यान किया जाता है। इसी चक्र में सूर्यबिम्ब के प्रतिनिधि नादमय उ(ओ)ड्ड्यान पीठ की स्थिति मानी जाती है॥ कण्ठस्थित षोडश दल कमल शुद्ध अर्थात् विशुद्धि चक्र के नाम से प्रसिद्ध है। इसका भी वर्णन वहाँ इस तरह से किया गया है— इससे एक अंगुल ऊपर षोडश दल वाला विशुद्ध चक्र है। इस चक्र के मध्य में १. दशार-क. घ. ज. झ.। २. नाभेरष्टा-ग. घ. ज. झ. उ.। ३. भितम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ.। ४. दूर्ध्वं-ग. ज. उ.। ५. बिम्बे-ख. झ. उ.। ६. ओडीयाना-ग.। ७. श्वरी-क. ग. ने.। ८. रान्ताश्च-क. ने । १. ड से फ पर्यन्त दस अक्षरों की अधिष्ठात्री डामरी आदि फट्कारी पर्यन्त देवियों का ध्यान यहाँ निहित है। २. क से ठ पर्यन्त बारह अक्षरों की अधिष्ठात्री कालरात्रि आदि ठंकारी पर्यन्त शक्तियों का ध्यान यहाँ करना चाहिये।