भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

५६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तथा ज्येष्ठाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः, यथा वामाशक्तिरिच्छाशक्तिसामरस्यमापन्ना सृष्ट्यात्मकशृङ्गाटवामरेखासीत् तथा ज्येष्ठाशक्तिरपि ज्ञानशक्तिसामरस्य- मापन्ना। विश्वस्थितौ प्रथितविग्रहा, सृष्टिविश्वस्थितौ ²हेतुभूतत्वात्। ऋजुरेखा- मयी। अत्र शृङ्गाटाग्ररेखाकारा। मध्यमा वागुदीरिता मध्यमामातृकात्व- मापन्ना ॥३८॥ तत्संहृतिदशायां तु बैन्दवं रूपमास्थिता ॥३९॥ प्रत्यावृत्तिक्रमेणैव शृङ्गाटवपुरुज्ज्वला। क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा ॥४०॥ सृष्टस्य स्थितस्य विश्वस्य संहारकाले, बैन्दवं रूपमास्थिता अम्बिका शान्ता- सामरस्यरूपा³ स्थिता, मध्यबिन्दोराविर्भूय सृष्टिं स्थितिं च सम्पाद्य तत्संहारो- जैसे वामा शक्ति इच्छा शक्ति से मिलकर शृंगाट की सृष्टिस্বরূপ वाम रेखा का आकार धारण करती है, उसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति ज्ञान शक्ति से मिलकर सृष्ट विश्व की स्थिति के कारणभूत शृंगाट के अग्रभाग की सीधी रेखा का स्वरूप ग्रहण करती है। उक्त दोनों शक्तियों की इसी समरस स्थिति को मध्यमा वाणी का प्रतीक माना जाता है। मातृका के सूक्ष्म रूप पश्यन्ती और स्थूल रूप वैखरी के बीच में इसकी स्थिति है, अतः इसको मध्यमा कहा जाता है ॥३८॥ उस विश्व की संहार दशा में पुनः अपने बैन्दव स्वरूप में प्रविष्ट होने की कामना से वह शक्ति लौट पड़ती है। इस तरह से शृंगाट की दक्षिण रेखा के निर्माण के साथ इसका पूर्ण स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार रौद्री और क्रिया शक्ति के मिलन से वाणी के सारे विस्तार को मुखरित करने वाली वैखरी वाणी का यह प्रतीक स्वरूप बनता है ॥३९-४०॥ सृष्ट और स्थित विश्व का संहार करते समय यह शक्ति पुनः बैन्दव¹ स्वरूप में प्रविष्ट हो जाती है, अर्थात् अम्बिका और शान्ता शक्ति के साथ एकरस हो जाती है। १. 'सामरस्य''''ज्ञानशक्ति' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. ड.। २. हेतुत्वात्-ख. ने. ज. झ.। ३. रूपेण-ग. ड.।

  1. समरस बिन्दु जब कामकला का स्वरूप धारण करता है, तो ऊर्ध्व बिन्दु काम तथा अधः स्थित बिन्दुद्वय कला के नाम से अभिहित होते हैं। ऊर्ध्व बिन्दु से निकली वामरेखा सृष्टि तथा ऋजुरेखा स्थिति कृत्य की प्रतीक है। संहार कृत्य की प्रतीक दक्षिण रेखा लौटकर पुनः बैन्दव स्वरूप में, अर्थात् प्रकाशात्मक कामबिन्दु में और अन्ततः समरस बिन्दु में लीन हो जाती है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)