भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५७ न्मुखी पुनर्बिन्दुमेव प्रविष्टेत्यर्थः। एवं प्रत्यावृत्तिक्रमेण, इयं रौद्री क्रियाशक्ति- सामरस्यात्, सैव शृङ्गाटवपुः शृङ्गाटस्य दक्षिणरेखा भूत्वा, उज्ज्वला शृङ्गाट- रूपेण भासमाना। शृङ्गाटं नाम त्रिकोणम्। वैखरी विश्वविग्रहा वाग्रूपप्रपञ्चमय- वैखरीरूपा जातेत्यर्थः ॥३९-४०॥ प्रकाशविमर्शांशरूपाणामम्बिकादीनां १शान्तादीनां चतसृणां शक्तीनां शृङ्गाट- रूपतामुक्त्वा पुनरिदानीं त्रिकोणान्तर्गतपीठाकारवर्णलिङ्गावस्थाचतुष्टयमयता- वासनामाह "भासनाद्विश्वरूपस्य" इत्यादिना "तुर्यरूपाण्यमूनि च" (१।४९) इत्यन्तेन— भासनाद् विश्वरूपस्य स्वरूपे बाह्यतोऽपि च। एताश्चतस्रः शक्त्यस्तु का पू जा ओ इति क्रमात् ॥४१॥ उत्तरार्धवक्ष्यमाणचतुष्टये २ हेतुमाह—भासनादिति। विश्वं शिवादिभूम्यन्तं नामरूपात्मकम्, तद्रूपस्य स्वरूपे बीजभावेन, बाह्यतः सृष्ट्यात्मना भासनात्, इसका तात्पर्य यह है कि मध्य बिन्दु से प्रकट होकर शक्ति सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्यों का सम्पादन करने के बाद जब संहार कृत्य में प्रवृत्त होती है, तो उस समय वह पुनः बिन्दु में प्रविष्ट हो जाती है। इस तरह से शक्ति की एक आवृत्ति पूरी हो जाती है। इस प्रत्यावृत्ति (वापस लौटना) के क्रम में रौद्री और क्रिया शक्ति के मिलन से शृंगाट की दक्षिण रेखा बनती है और इस तरह से शृंगाट का पूर्ण स्वरूप भासित हो उठता है। शृंगाट शब्द यहाँ त्रिकोण के अर्थ में प्रयुक्त है। सिंघाड़े का आकार त्रिकोणा- त्मक ही होता है। यह तृतीय रेखा वैखरी वाणी की प्रतीक है, जो कि वाणी के सारे स्थूल प्रपंच को मुखरित करती है ॥३९-४०॥ इस तरह से प्रकाश की अंशभूत अम्बिका आदि तथा विमर्श की अंशभूत शान्ता प्रभृति चार-चार शक्तियों से सम्पन्न शृंगाट के स्वरूप का वर्णन करने के बाद अब पुनः इस शृंगाटसदृश त्रिकोण के अन्तर्गत विद्यमान पीठों की, उनके आकार और वर्ण को, चार लिंगों और चार अवस्थाओं की भावना का वर्णन आगे (१।४१-४९) किया जा रहा है— नामरूपात्मक जगत् को जब ये चार शक्तियाँ अपने भीतर और बाहर प्रकाशित करती हैं, तो का पू जा ओ नामक पीठों का स्वरूप धारण कर लेती हैं ॥४१॥ सबसे पहले ४१ वें श्लोक के उत्तरार्ध में कहे जाने वाले चार पीठों के हेतु (कारण) का वर्णन 'भासनात्' इस पंक्ति में किया गया है। विश्व का अर्थ है शिव से लेकर पृथ्वी १. 'शान्तादीनां' नास्ति—ग. झ. ड.। २. ष्टयत्वे—ग. ने. ड.।