योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः एताश्चतस्रः शक्तयस्तु "शक्लृ १व्याप्तौ" (१२६२ स्वा०) इत्यस्माद् धातोः शक्तिशब्दव्युत्पत्तिः । चतस्रः २अम्बिकाद्याः शान्ताद्याश्चतस्रः । क्रमेण परस्परं सामरस्यमापन्नाः का पू जा ओ इति क्रमादासन् । का कामरूपपीठम्, पू पूर्णगिरि- पीठम्, जा जालन्धरपीठम्, ओ ओड्याणपीठम् । प्रकाशविमर्शात्मतया समरसी- भूताः पूर्वोक्ताश्चतस्रः शक्तयः कामरूपपूर्णगिरिजालन्धरौड्याणपीठरूपेण परिणता ३इत्यर्थः ॥४१॥ पीठचतुष्टयस्य पिण्डादिमयतावासनामाह— पीठाः कन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः । ४कन्दं नाम सुषुम्नामूलम् । कन्दशब्देन तत्रस्था पिण्डाख्या कुण्डली लक्ष्यते । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— "५नयित्वा तं सुषुम्नाऽधः कन्दस्थाने च मारुतम् । इच्छाज्ञानक्रियारूपां कुण्डलीं परमेश्वरीम् ॥ प्रसुप्तभुजगाकारां मातृकारूपिणीं शिवाम् । इति । पर्यन्त नामरूपात्मक जगत् । इस विश्व के स्वरूप में बीजभाव से भीतर और सृष्टिभाव से बाहर उक्त चार शक्तियों का ही भासन होता है । व्याप्ति अर्थवाली 'शक्लृ' धातु से शक्ति शब्द बनता है । अम्बिका आदि और शान्ता आदि चार-चार शक्तियाँ क्रमशः परस्पर मिलकर का पू जा ओ बन जाती हैं । का से कामरूप पीठ, पू से पूर्णगिरि पीठ, जा से जालन्धर पीठ और ओ से ओडद्याण पीठ समझना चाहिये । प्रकाश और विमर्श स्वरूप उक्त चार-चार शक्तियाँ जब समरस हो जाती हैं, तो उनका अगला परिणाम कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओडद्याण पीठ के रूप में होता है ॥४१॥ इन चार पीठों की पिण्ड आदि के रूप में भावना करनी चाहिये— ये चार पीठ क्रमशः कन्द, पद, रूप और रूपातीत में स्थित हैं । सुषुम्ना नाडी का मूल स्थान कन्द कहलाता है । यहाँ कन्द शब्द से उसमें विराज- मान कुण्डलिनी शक्ति, जिसको पिण्ड भी कहते हैं, गृहीत होती है । स्वच्छन्दसंग्रह इसमें प्रमाण है— उस पवन को सुषुम्ना के मूल में विद्यमान कन्द स्थान में ले जाना चाहिये और वहाँ सोये हुए सर्प के समान आकारवाली मातृकास्वरूपिणी और इच्छा-ज्ञान-क्रिया शक्ति समष्टिरूपिणी भगवती कुण्डलिनी का मंगलमय दर्शन करना चाहिये ॥ १. 'शक्तौ' इति धातुपाठस्थः पाठः । २. 'अम्बिकाद्याः शान्ताद्याश्चतस्रः' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ३. 'इत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कन्द इति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. लङ्घित्वा-ख. झ., लयित्वा-ग. उ. ।