भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] Deepika Bhashanuvada Sahitam ६५ ज्योतिः' (मु० उ० २।२।९) इति। स्वसंविदुदयात्मकं सर्वप्राणिष्वात्मतया स्थितम्। तदुक्तं नवशतीशास्त्रे—'“अनन्तं परमं ज्योतिः सर्वप्राणिहृदि स्थितम्” इति ॥४९॥ चक्रस्य पुनर्वासनान्तरकथनाय विश्वातीतं वस्तु कथयित्वा वक्तव्यां वासनामाह— स्वेच्छाविश्वमयोल्लेखखचितं विश्वरूपकम्। विश्वमयोल्लेखः, विश्वं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकम्, तन्मयः उल्लेखः, उल्लिख्यत इति उल्लेखः चित्रम्, तेन स्वेच्छाविश्वमयोल्लेखेन खचितं व्याप्तं स्वेच्छातुलिक- याऽऽत्मभित्तौ [२मायाचित्रमुल्लिखतीत्यर्थः। तदुक्तमीश्वरप्रत्यभिज्ञायाम्—"स्वेच्छया स्वभित्तौ] विश्वमुन्मीलयति (प्र० हृ० २) इति। अत्र प्रमाणवचनं च— जगच्चित्रं ३समालिख्य ४स्वेच्छातूलिकयाऽऽत्मनि। स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान् शिवः॥ इति। विश्वरूपकम्। अत एव शिवादिक्षित्यन्तरूपेण परिणतमित्यर्थः। यथा क्षीरं

इसको सभी प्रकाशों का प्रकाशक कहा गया है। यह तत्त्व सभी प्राणियों में अपनी आत्मा के रूप में भासित होता है। नवशती शास्त्र में बताया गया है—"यह अनन्त परम ज्योति सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान है"॥४९॥ चक्र की भावना का दूसरा प्रकार बताने के लिये विश्वोत्तीर्ण तत्त्व का उपदेश करने के बाद अब उसकी भावना का प्रकार बताते हैं— यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व अपनी इच्छा से अपने में विश्वमय चित्र का निर्माण कर विश्वमय हो जाता है॥ यह ३६ तत्त्वों से बना जगत् ही विश्व कहलाता है। उल्लेख चित्र को कहते हैं। विश्वोत्तीर्ण तत्त्व अपनी इच्छा से विश्वमय चित्र का स्वरूप धारण कर लेता है, अपनी इच्छा रूपी तूलिका से स्वयं अपने को ही आधार बनाकर उसमें मायामय चित्र का निर्माण कर लेता है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में भी बताया गया है—"चिति शक्ति अपनी इच्छा से स्वात्मस्वरूप भित्ति (दीवाल) पर विश्व का उन्मीलन (चित्रण) करती है"॥ इस प्रसंग में एक प्रामाणिक व्यक्ति का वचन भी उपलब्ध है— भगवान् शिव अपनी इच्छारूपी तूलिका से अपने में ही इस जगत् रूपी चित्र का निर्माण करते हैं और फिर उसको देखकर प्रसन्न भी होते हैं॥ इस तरह से जगत् रूपी चित्र का निर्माण कर वह स्वयं उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त तत्त्वों के रूप में परिणत हो जाते हैं। जैसे दूध दही के रूप


पादटिप्पणी: १. अनर्क्कं-ख. ग. ज. उक., अमनस्कं परं-उग.। २. कोष्ठान्तर्गतः पाठः कपुस्तकं विहाय क्वापि न दृश्यते। ३. समहिलख्य-ख.। ४. स्वात्म-ने. उ.।