भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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६६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः दध्याकारेण परिणमते, तथा चिच्छक्तिरेव विश्वाकारेण परिणमते। तदुक्तं ^१श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू० १) इति। तेन किमायातं ^२परमशिवस्येत्यत आह— चैतन्यमात्मनो रूपं निसर्गानन्दसुन्दरम् ॥५०॥ चैतन्यं चिद्विमर्शशक्तिः, आत्मनः प्रकाशात्मनः परशिवस्य, रूपं निसर्गा- नन्दसुन्दरं तत्सामरस्येन सहजानन्दोल्लासादखिलस्य स्पृहणीयम्। विमर्शशक्तिः प्रकाशात्मना परशिवेन सामरस्याद् विश्वं सृजति, न तु केवला। यथा न केवलेन तुषेणाङ्कुरो जायते, नापि तण्डुलेन, किन्तुभाभ्यामयुतसिद्धसंबन्धशालिभ्याम्। तदुक्तं ^३स्वच्छन्दसंग्रहे—"शिवाऽभिन्ना पराशक्तिः सर्वक्रमशरीरिणी" इति ॥५०॥ तदेवाह— मेयमातृप्रमामानप्रसरैः संकुचत्प्रभम् । शृङ्गाटरूपमापन्नमिच्छाज्ञानक्रियात्मकम् ॥५१॥ में परिणत होता है, उसी तरह से चिति शक्ति ही विश्व का आकार धारण कर लेती है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चिति शक्ति स्वतन्त्र रूप में बिना किसी की सहा- यता से इस विश्व की रचना में समर्थ है"॥ ऐसा करने से परमशिव का क्या बनता है? इसका उत्तर देते हैं— वह पर प्रकाशात्मक स्वरूप इस तरह से विमर्श शक्ति से संपन्न होकर सहज आनन्द की सृष्टि का कारण बनकर; सबके लिये स्पृहणीय हो जाता है ॥५०॥ चैतन्य पद यहाँ चितिस्वरूपा विमर्श शक्ति का बोध कराता है। आत्मा अर्थात् प्रकाशात्मक परशिव का स्वरूप उस विमर्श शक्ति के साथ समरस होकर सहज आनन्द की सृष्टि करता है और इस तरह से सबका स्पृहणीय बन जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि विमर्श शक्ति प्रकाशात्मक परशिव के साथ मिलकर विश्व की रचना करती है, अकेली नहीं। जैसे केवल तुष या तण्डुल (चाँवल) से अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु जब दोनों अभिन्न रूप में विद्यमान रहते हैं, तभी उनसे अंकुर निकलता है, उसी तरह से केवल शिव या शक्ति से जगत् की सृष्टि नहीं होती, किन्तु दोनों मिलकर ही सृष्टि कर सकते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"शिव से अभिन्न रूप में विद्यमान परा शक्ति क्रमशः सारे विश्व का शरीर धारण करती है" ॥५०॥ आगे इसी क्रम को बताया गया है— संवित्ति जब मेय, माता, प्रमा और प्रमाण के रूप में फैलती है, तो उसकी प्रभा संकुचित हो जाती है और वह इच्छा, ज्ञान, क्रियात्मक शृंगाट का स्वरूप धारण कर लेती है ॥ ५१ ॥ १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञायामिति परिदृश्यमानः पाठोऽनुचितः। २. देवस्ये—ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । ३. महास्वच्छन्द—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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