योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६७ मेयं प्रमेयम् । प्रमाविषयः सम्यगनुभवः प्रमा । तद्वान् प्रमाता । प्रमाकरणं प्रमाणम् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे— मितिः सम्यक्परिच्छित्तिस्तद्वत्ता च प्रमातृता । तद्योगव्यवच्छेदः प्रामाण्यं गौतमे मते ॥ (कु० का० ४।५) इति । निर्विकल्परूपायाः स्वसंविदो मातृमेयप्रमाणप्रमारूपेण विकल्पात्मना प्रसर एव संकोचः । शिवस्य प्रकाशात्मनो १दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा । सा२ निर्वि- कल्पात्मना विश्वाकारा मेयमातृप्रमाप्रमाणभेदैः संकुचद्रूपा, तदा३ शिवोऽपि संकुच- द्रूपः । एतदुभयमिच्छाज्ञानक्रियात्मकम् इच्छादिवामादिशक्त्यंशभेदभिन्नं शृङ्गाट- रूपमापन्नं त्रिकोणरूपेण परिणतम् ॥५१॥ पूर्वं “बीजत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोः पुनः” (१।४८) इत्यत्र कामकलादि- काया विद्यायाः श्रीचक्रहेतुभूतत्रिकोणमयपीठादिचतुर्मयतामुक्तेवेदानीं देवताया मेय प्रमेय को कहते हैं । विषय की सम्यक् प्रतीति प्रमा कहलाती है । इस सम्यक् प्रतीति से जो युक्त हैं, उसे प्रमाता और प्रमा के साधन को प्रमाण कहते हैं । कुसुमा- ञ्जलिकारिका में इनके लक्षण बताये गये हैं— न्याय मत में सम्यक् परिच्छित्ति ( ज्ञान ) को मिति ( प्रमा ) कहते हैं । यह सम्यक् ज्ञान जिसको होता है, वह प्रमाता कहलाता है और प्रमा के साथ निरन्तर संयोग का ही नाम यहां १प्रामाण्य है । निर्विकल्पात्मक स्वात्मसंवित्ति जब विकल्पात्मक माता, मेय, प्रमा और प्रमाण के रूप में फैलती है, तो उसका स्वरूप संकुचित हो जाता है । प्रकाशात्मक शिव दीपक है, तो विमर्श शक्ति उसकी प्रभा है । निर्विकल्पक स्वरूप में वह विश्वस्वरूप है, किन्तु वह विमर्श शक्ति जब मेय, माता, प्रमा, प्रमाण रूप विकल्पों का स्वरूप धारण कर अपने स्वरूप को संकुचित कर लेती है, परिमित कर लेती है, तो शिव भी परिमित प्रमाता बन जाते हैं । तब शिव और शक्ति दोनों इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक और वामा-ज्येष्ठा-रौद्रात्मक शक्तियों का स्वरूप धारण कर त्रिकोण के आकार में परिणत हो जाते हैं ॥ ५१ ॥ “बीजत्रितय” (१।४८) इत्यादि श्लोक में यह बताया गया है कि कामकला स्वरूप श्रीविद्या ही श्रीचक्र को निष्पत्ति में कारणभूत त्रिकोणमय पीठचतुष्टय आदि के रूप १. जीवस्य-ख. ग. ने. झ. उ. । २. सा तु निर्विकारा-ने. ज. झ. उ. । ३. तथा- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. न्याय मत में ज्ञान का प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों परतः गृहीत होते हैं । ज्ञान की संवादकता के आधार पर प्रामाण्य का तथा विसंवादिता के आधार पर उसके अप्रामाण्य का निश्चय अनुमान प्रमाण द्वारा किया जाता है । इसी अभिप्राय से यहां प्रमा के साथ निरन्तर संयोग, अर्थात् संवादकता की बात कही गई है ।