भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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७० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः चेत्यष्टधाभिन्नहेतिमत्। कोऽर्थः¹ ? परशिव एव प्रकाशविमर्शात्मना² निजावंशौ विभज्य कामेश्वरः कामेश्वरीति भूत्वा पाशाङ्कुशधनुश्शरान् पुंस्त्रीभेदेनाष्टौ धृत्वाऽऽश्रयाश्रयिभावेन स्वरमयमध्यत्रिकोणमध्यगतसदाशिवारूख्यबैन्दवचक्रे तुरीय- बिन्दुमये परलिङ्गे निवसतीत्यर्थः। इदमेव मिथुनं नवधा ³विभज्यात्मानं नवचक्रेषु स्थितमित्याह— अष्टारचक्रसंरूढं नवचक्रासनस्थितम् ॥५४॥ पूर्वोक्तक्रमेण तदेव वामादीच्छा⁴दिशक्तिमयं त्रिकोणमेव त्रिधा विभिन्नं द्विशक्त्येकवह्निभेदेनाष्टारचक्रमभूत्। पुनस्तदेव⁵ त्रिपदं वह्निशक्तिरूपं च भूत्वा नवचक्रमभूत्। एवंरूपं श्रीचक्रं स्वयमेवाष्टारचक्रम्, शब्द आयुध (शस्त्र) का वाचक है। आश्रय कामेश्वर के चार और आश्रयी कामेश्वरी के चार—इस तरह से आठ आयुधों से यह स्वरूप शोभित है। इसका अभिप्राय यह है कि परम शिव ही प्रकाश और विमर्श के रूप में विभक्त होकर कामेश्वर और कामेश्वरी युगल का स्वरूप धारण कर लेता है और तब आश्रय तथा आश्रयी के भेद से, स्त्री और पुरुष के भेद से पाश, अंकुश, बाण और धनुष नामक आयुधों को अलग अलग धारण करके स्वरों से सुशोभित त्रिकोण चक्र के मध्य में विद्यमान सदाशिव रूपी बैन्दव चक्र में, जो कि तुरीय बिन्दुमयं स्थान है और जिसमें परलिंग का भी निवास है, विराजमान हो जाता है। यही मिथुन स्वरूप नवधा विभक्त होकर नौ चक्रों में स्थित है— त्रिकोण और अष्टार के क्रम से यही युगल स्वरूप क्रमशः नवचक्ररूपी आसन पर आरूढ हो जाता है ॥ ५४ ॥ पहले (१।१२-१४) बताया जा चुका है कि वामा आदि और इच्छा आदि तीन-तीन शक्तियों का प्रतीक त्रिकोण चक्र ही दो शक्ति और एक वह्नि के रूप में परिणत होकर अष्टार चक्र बन जाता है। तीन त्रिकोण वाला यह अष्टार चक्र ही पुनः वह्नि और शक्ति त्रिकोणों के विस्तार से नौ चक्रों का स्वरूप धारण कर लेता है। इस प्रकार श्रीचक्रमय आठ आयुधों को धारण करने वाला यह कामेश्वर-कामेश्वरी युगल-स्वरूप ही अष्टार चक्र में आरूढ हो जाता है। १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. त्मकौ-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ३. प्रवि-ने.। ४. च्छादिमयं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. तदेव शक्तिरूपं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.।