भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७१ चितिश्चित्तं$^१$ च चैतन्यं चेतनाद्वयकर्म$^२$ च । जीवः कला $^३$शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या निजं सूक्ष्मं पुर्यष्टकं विभज्याष्टारचक्रं वशि- न्यादिक्रमेण संरूढमित्यर्थः । नवचक्रासनस्थितम् एवंरूपं मिथुनमेव निजाधार- नवकं नवचक्रत्वेन विभज्य निजनादशक्तिनवकं नवचक्रेश्वरीरूपेण संपाद्य, इच्छादिशक्तित्रितयं पशोः सत्त्वादिसंज्ञकम् । $^४$महत्त्र्यस्रं चिन्तयामि गुरुवक्त्रादनुत्तरात्$^५$ ॥१८॥ अष्टारांशप्रदेशोऽयं$^६$ चिन्निर्याणेषु$^७$ सादिकम्$^८$ । सूक्ष्मं पुर्यष्टकं देव्या मतिरेषा हि गौरवी ॥१७॥ चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर—इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ स्वच्छन्दसंग्रह के इस वचन के अनुसार यह कामेश्वर-कामेश्वरी युगल अपने सूक्ष्म पुर्यष्टकमय शरीर को विभक्त कर इस अष्टार चक्र में वशिनी प्रभृति आठ देवियों के रूप में विराजमान हो जाता है। यही युगल स्वरूप अपने नौ आधारों को नौ चक्रों के रूप में विभक्त कर अपनी नौ नाद शक्तियों को नौ चक्रेश्वरियों का स्वरूप प्रदान कर देता है । शिवानन्द की $^१$शुभ्रमोदयवासना में यह स्थिति इस तरह से वर्णित है— पशु (अज्ञ जीव) की इच्छा आदि तीन शक्तियां ही सत्त्व, रज और तमोगुण हैं। गुरु के मुख से उपदिष्ट पद्धति से मैं इसी रूप में महात्र्यश्र (मूल त्रिकोण) की भावना करता हूँ। $^२$चिच्छक्ति के निर्गमन का प्रथम कारण देवी का सूक्ष्म पुर्यष्टकमय शरीर ही १. इच्चैत्यं-ग. ज. उ. । २. द्वयमेव च-ग. झ. उ., द्वयमेव च-चि. । ३. च देवेशि-क. ख. ने. । ४. महा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दनन्तरम्-ग. उ. । ६. रकप्रदेशो-ग. । ७. चिन्निर्वाणैषणादिकम्-मु., विनि-ने. ज. झ. उ., वत्-ग. ब. उ. । ८. चि. पाठोऽत्र स्थापितः । १. यह ग्रन्थ भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० २९७-३०३) में प्रकाशित हो चुका है। दीपिकाकार ने योगिनीहृदय के सृष्टिक्रम को ध्यान में रखकर वहां के श्लोकों का क्रम बदल दिया है। शिवानन्द ने अपने ग्रन्थ में संहार क्रम से श्रीचक्र की वासना बताई है । २. श्रीचक्र की सर्वतत्त्वात्मकता के प्रतिपादक इस प्रकरण पर उपोद्घात में विस्तार से विचार किया गया है।