भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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७२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अन्तर्दशारवसुधा ज्ञानकर्मेन्द्रियावलिः। महात्रिपुरसुन्दर्या इति संचिन्तयाम्यहम् ॥१६॥ बाह्यो दशारभागोऽयं बुद्धिकर्माक्षगोचरः ॥१५॥ चतुर्दशारवसुधा¹ करणानि चतुर्दश ॥१४॥ वसुच्छदनपद्माङ्कदेशो यश्चक्रगो विभुः। अव्यक्ताद्याः प्रकृतयो भूतान्ता निश्चिनोम्यहम् ॥१३॥ षोडशच्छदपद्माङ्कदेशो² भूताक्षमानसम्। विकारात्मकतापन्नं देव्या संभावयाम्यहम् ॥१२॥ इति³ सुभगोदयवासनोकरीत्या बैन्दवादिचतुरस्रान्तेषु नवचक्रेष्वासनभूते- ष्विन्द्रियादिरूपेण स्थितमित्यर्थः ॥५४॥ एवंरूपं परं तेजः श्रीचक्रवपुषा स्थितम्। एवंरूपम् उक्तप्रकारेण विभक्तनिजेच्छादिषोडशविकारान्तावयवमयत्रिकोणादि- चतुरस्रान्त⁴श्रीचक्र⁵वपुषा स्थितमित्यर्थः। अष्टार चक्र के नाम से प्रसिद्ध हो गया है, यह ज्ञान भी हमें अपने गुरु से ही मिलता है। अन्तर्दशार का आधार महात्रिपुरसुन्दरी के ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय से बना है, ऐसी मैं भावना करता हूँ। इस चक्र का बाह्य दशार भाग ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के विषयों का परिणाम है। चतुर्दशार चक्र का आधार चौदह इन्द्रियाँ हैं। चक्र में जो आठ दल वाला पद्म है, वह अव्यक्त, महत्, अहंकार और पंचतन्मात्रा रूप आठ प्रकृतियों का परिणाम है, ऐसा मैं निश्चय करता हूँ। इस चक्र का षोडश दल पद्म वाला प्रदेश देवी से आविर्भूत १६ विकारों (पांच महाभूत और मन सहित एकादश इन्द्रिय) का प्रतिनिधि है, ऐसी मैं भावना करता हूँ'। इसका अभिप्राय यह है कि बैन्दव से लेकर चतुरस्र पर्यन्त नौ चक्रों में, जो कि देवी के निवास के स्थान हैं, इन्द्रिय आदि ऊपर बताये गये विभिन्न रूपों में स्वयं देवी ही अवतरित होती है ॥५४॥ इस तरह से यह परम तेज ही श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर विद्यमान है॥ ऊपर बताई गई पद्धति से इच्छा शक्ति से लेकर षोडश विकार पर्यन्त विविध अवयवों (स्वरूपों) को धारण कर प्रकाशविमर्शात्मक यह परम तेजस्वी युगल स्वरूप ही त्रिकोण से लेकर चतुरस्र पर्यन्त श्रीचक्र का शरीर धारण कर लेता है॥ १. धरणी-मु.। २. पद्मोऽयं भागो-मु.। ३. इत्यादि-ने. ग. उ.। ४. इतः परम्- 'त्रिकोणरूपं स्थितमित्यतश्चतुरस्रान्त' इत्यधिकं ने.। ५. श्रीपीठ-ग.।