योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७३ इत्थं तस्मिन् मिथुने श्रीचक्रवपुषा परिणते सति तदीया १वयवशक्तय एवा- वरणदेवतारूपेण स्थिता २इत्याह— तदीयशक्तिनिकरस्फुरदूर्मिसमावृतम् ॥५५॥ तयोः कामेश्वरकामेश्वर्योरेवावयवास्तदीयावयवाः, तेषां शक्तयः, तासां निकराः समूहाः, ते च स्फुरन्त एवोर्मयस्तरङ्गाः, तैः समावृतम्। कोऽर्थः ? प्रकाशविमर्शमयकामेश्वरकामेश्वरीस्वेच्छागृहीतविग्रहावयवेषु ३चक्रावयवतामुप- गतेषु तदवयवशक्तयोऽपि कामेश्वरी-वज्रेश्वरी-भगमालिन्याद्यावरण४देवतारूपेण परिवार्य तिष्ठन्तीत्यर्थः५। ऊर्मिशब्देनेदं द्योत्यते—प्रकाशात्मकः परमेश्वरः समुद्रः, विमर्शरूपिणी कामेश्वरी सलिलम्, तदीयावयवाः शक्तिनिकरा ऊर्मयः। यथा इस तरह से उस कामेश्वर-कामेश्वरी मिथुन के श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर लेने पर उसके अवयवों में विद्यमान शक्तियाँ ही आवरण देवताओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं। यही विषय आगे वर्णित है— उस मिथुन की अवयव शक्तियों का समूह समुद्र से उठी हुई तरंगों के समान उसको घेर लेता है ॥५५॥ कामेश्वर और कामेश्वरी के विभिन्न अवयवों से उत्पन्न शक्तियों का समूह समुद्र से उठी हुई तरंगों के समान उस युगल स्वरूप को चारों तरफ से घेर लेता है। इसका अभिप्राय यह है कि प्रकाशविमर्शस्वरूप कामेश्वर-कामेश्वरी युगल अपनी इच्छा से जो शरीर धारण करता है, उस शरीर के विभिन्न अवयव ही चक्र के अवयवों का स्वरूप धारण कर लेते हैं और इस तरह से उसकी इच्छा प्रभृति अवयव शक्तियाँ ही कामे- श्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी आदि १आवरण देवताओं के रूप में उसको घेर लेती हैं। यहाँ ऊर्मि शब्द विशेष अभिप्राय से प्रयुक्त हुआ है। तदनुसार यह प्रकाशात्मक परमेश्वर समुद्रस्थानीय है। विमर्शस्वरूपिणी कामेश्वरी जल का प्रतिनिधित्व करती है। उसकी अवयवशक्तियों का समूह लहरों का बोध कराती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे लहरियाँ समुद्र में उठती हैं और उसी में लीन भी हो जाती हैं, उसी तरह से ३६ १. या अव-ने. झ. उ.। २. इत्यर्थः-ग. ने. उ.। ३. 'चक्रा'''गतेषु' नास्ति-ख. ने. ज. झ.। ४. रणं परिवार्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. इतः परम्-'एवमूर्भयस्तरङ्गास्तैः समावृतं परिवृतम्। कोऽर्थः-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। १. नित्याषोडशिकार्णव (१।१५३-१८२) में मध्यबिन्दुनिवासिनी भगवती त्रिपुर- सुन्दरी (मुख्य देवता) और चतुरस्र आदि चक्रों की अधिष्ठात्री आवरण देवताओं का संहारक्रम से वर्णन किया गया है। इस विषय पर आगे (२।५७) विचार किया जायेगा। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)