भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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७४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः कल्लोलाः समुद्रे जायन्ते तत्रैव लीयन्ते, एवं १षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं सशक्तिकं चक्रं तत्रैवोदेत्यस्तमेति चेति तात्पर्यम् । तत्राभियुक्तवचनम्— मूलोद्भवं शक्तिचक्रं यतस्तन्मयतां गतम् । तस्मिन्नेवाव्यये तत्त्वे विलीनं २परिभावयेत् ॥ ३मूलं स्वात्मनि चिद्रूपे यजेद् यत्तत् तदेव हि । इति ॥५५॥ (सु० ६७-६८) सर्वचक्रवासनामुक्त्वा तेषु सवासनं मुद्राभेदमाह “चिदात्मभित्तौ” इत्यादिना “एवं चक्रमयम्” इत्यन्तेन (श्लो० ५६-७१)— चिदात्मभित्तौ विश्वस्य प्रकाशामर्शने यदा । करोति स्वेच्छया पूर्णविचिकीर्षासमन्विता ॥५६॥ तत्त्वों का प्रतिनिधि यह समस्त शक्तिचक्र युगल स्वरूप से ही निकलता है और उसी में लीन भी हो जाता है, शिवानन्द मुनि ने भी सुभगोदय में इसी विषय का वर्णन किया है— १मूल स्वरूप (भगवती त्रिपुरसुन्दरी) से उत्पन्न हुआ शक्तिचक्र अब पुनः तन्मय हो गया है, उसी अव्यय तत्त्व में लीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये । उस मूल स्वरूप की भी चिद्रूप स्वात्मा में ही उपासना करनी चाहिये, क्योंकि इष्ट देवता की जिन पत्र-पुष्प आदि से पूजा की जाती है, वे सब चिद्रूप स्वात्मा से भिन्न नहीं हैं ॥५५॥ सभी चक्रों की भावना का प्रकार इस प्रकार उपदिष्ट हुआ, अब आगे (१।५६-७१) के श्लोकों में विभिन्न मुद्राओं का और उनकी भावना का प्रकार बताया जा रहा है— चित्-शक्ति स्वात्मस्वरूप भित्ति में जब स्वेच्छा से विश्व की रचना के लिये परिपूर्ण इच्छा शक्ति से संपन्न हो प्रकाश और विमर्श का सहारा लेती है, उस १. एवं तत्त्वमयं शक्तिचक्रं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. तद्विभा-मु. । ३. मूले- क. ग. झ. उ. । I. सुभगोदय में शिवानन्द ने श्रीचक्र की पूजाविधि का संक्षेप में वर्णन किया है । वहाँ विसर्जन की विधि का निरूपण करते हुए वे कहते हैं कि मूलस्वरूप (त्रिपुर- सुन्दरी) से ही शक्तिचक्र, अर्थात् आवरण देवताओं का आविर्भाव होता है, अतः विसर्जन के समय ऐसी भावना करनी चाहिये कि वे सभी आवरण देवता मूल स्वरूप में पुनः विलीन हो गये हैं । किं बहुना, वह मूलस्वरूप भी स्वात्मचिद्रूप में लीन हो गया है । विसर्जन का यही आध्यात्मिक स्वरूप त्रिपुरा सम्प्रदाय में मान्य है ।