भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७५ क्रियाशक्तिस्तु विश्वस्य मोदनाद् द्रावणात् तथा । मुद्राख्या चिद् विमर्शशक्तिः । आत्मभित्तौ आत्मैव भित्तिरात्मभित्तिस्तस्याम्^१, स्वस्वरूप- मेव भित्तिरित्यर्थः । विश्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य । प्रकाशामर्शने । अस्फुटस्य स्फुटी- कारः प्रकाशः, इदन्तया हृदयङ्गमीभावो विमर्श ^२एवामर्शनम् । एवंविधे प्रकाशा- मर्शने, यदा सृष्टिकाले, पूर्णविचिकीर्षासमन्विता, विशेषेण कर्तुमिच्छा विचिकीर्षा । विकारः क्षीरादीनामप्यस्ति, आतञ्चनादिना^३ । अत एवाह-पूर्णविचिकीर्षा- समन्वितेति । तत्र^४ तु क्षीरादेर्दध्यादिमात्रमेव विकारः, अत्र तु शिवादिक्षित्यन्तं तत्त्वाकारेण विकारः । अत एव पूर्णविचिकीर्षासमन्विता । क्रियाशक्तिस्तु क्रिया- शक्तिरेव भूत्वा । तुरवधारणे । एवंविधस्य विश्वस्य मोदनाद् द्रावणाच्च । अत्र त्वनुकूलक्रियैव मोदनम् । द्रावणं नाम तदेकरसीभावः । “संविद् मुद्राख्यां लभते । अयमर्थः-यदा विमर्शशक्तिर्विश्वरूपेण ^५विहर्तुमिच्छति, तदा क्रिया- समय उसकी क्रिया शक्ति विश्व के मोदन और द्रावण व्यापार में प्रवृत्त हो मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है ॥५६-५७॥ चित्स्वरूपिणी विमर्श शक्ति अपने स्वरूप को ही भित्ति बना कर उसमें शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सारे जगत् का प्रकाश और आमर्शन करती है। यहाँ अस्पष्ट वस्तु को स्पष्ट कर देना प्रकाश शब्द का और उस स्पष्ट वस्तु को 'इदं' (यह) रूप से ग्रहण करना आमर्शन शब्द का अर्थ है। सृष्टि करते समय यह चित्-शक्ति विचिकीर्षा से परि- पूर्ण हो जाती है। विचिकीर्षा शब्द का अर्थ है अपने को पूरी तरह से बदल डालने की इच्छा। आतंचन (जामन) आदि देने से दूध आदि में भी विकार आ जाता है। वहाँ दूध ही दही के रूप में बदल जाता है। यहाँ तो चित्-शक्ति का शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त परिणाम चेतन ही नहीं, जड़ रूप में भी हो जाता है। इसी अर्थ को बताने के लिये यहाँ 'पूर्णविचिकीर्षा' शब्द का प्रयोग किया गया है। चित्-शक्ति का जब इस तरह से परिणाम होने लगता है, उस समय उसकी क्रिया-शक्ति ही इस परिणत विश्व के मोदन और द्रावण में लग जाती है। अनुकूल कार्य का सम्पादन मोदन और उसमें तन्मयता द्रावण शब्द का अर्थ है। इस तरह से मोदन और द्रावण व्यापार में लगी क्रिया शक्ति ही 'मुद्रा' नाम से जानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि जब विमर्श शक्ति विश्व का स्वरूप धारण कर विहार करना चाहती है, तब पहले वह क्रिया शक्ति बन जाती है और १. 'तस्याम्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २ 'एवामर्शनम्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. दीनाम्-क. ख. ग. नै. । ४. 'तत्र तु' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'विहर्तुं' नास्ति-क. 'विहर्तुमिच्छति'-ख. 'विहर्तुकामा'-ग. 'विहर्तुकाम्यया'-ने. ज. झ. उ. ।