योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः शक्तिर्भूत्वा स्वविकारभूतस्य विश्वस्य परचिदानन्दलक्षणेन मोदनेन तदैक्यरस्य- लक्षणेन द्रावणेन च मुद्रारूपमापन्नेत्यर्थः ॥५६-५७॥ तत्रादौ व्यापिकां त्रिखण्डामुद्रामाह— सा यदा संविदम्बिका त्रिकलामयी ॥५७॥ त्रिखण्डारूपमापन्ना सदा संनिधिकारिणी । सर्वस्य चक्रराजस्य व्यापिका परिकीर्तिता ॥५८॥ सा विमर्शरूपिणी संवित्, १त्रिकलामयी वामाज्येष्ठारौद्रीरूपकलात्रयसमष्टि- रूपा अम्बिका २भूत्वा, ३अम्बिकाग्रहणं ४शान्ताया अप्युपलक्षणम् । इच्छाज्ञानक्रिया- शक्तिरूपकलात्रयसमष्टिरूपा शान्तात्मिकाऽपि भूत्वेत्यर्थः । त्रिखण्डारूपमापन्ना । दक्षिणाङ्गुलयो वामाद्याः प्रकाशांशाः वामाङ्गुलय इच्छाद्या विमर्शांशाः । तदुभयसंयोगरूपबन्धनात्मकखण्डत्रयवती त्रिखण्डा मुद्रा जातेत्यर्थः । सदा तब अपने ही परिणाम स्वरूप विश्व को परम चिदानन्द के अंशभूत लौकिक आनन्द से परिपूर्ण कर उसको परम चिदानन्द की तरफ बहा ले जाने का उपक्रम करने के लिये मुद्रा का रूप धारण कर लेती है ॥५६-५७॥ सबसे पहले व्यापिका त्रिखण्डा मुद्रा का वर्णन करते हैं— यह विमर्शरूपिणी संवित् पहले तीन कलाओं वाली अम्बिका शक्ति का और तब त्रिखण्डा मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। यह मुद्रा भगवती त्रिपुरा के पास पहुँचाने वाली है। श्रीचक्र के सभी अवयवों में व्याप्त रहने से इसको व्यापिका भी कहा जाता है ॥५७-५८॥ वह विमर्शरूपिणी संवित् पहले वामा, ज्येष्ठा और रौद्री स्वरूप तीन कलाओं वाली समष्टिस্বরূপिणी अम्बिका शक्ति का रूप धारण करती है। यहाँ अम्बिका शक्ति शान्ता शक्ति का भी बोध कराती है, क्योंकि शान्ता शक्ति भी इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक तीन कलाओं का समष्टि स्वरूप है। इस तरह से संवित् तीन कलाओं वाली अम्बिका और शान्ता शक्ति का प्रातिनिध्य सी करती हुई त्रिखण्डा मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। दाहिने हाथ की अंगुलियां प्रकाश से आविर्भूत वामा प्रभृति शक्तियों का और बायें हाथ की अंगुलियां विमर्श से आविर्भूत इच्छा प्रभृति शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। दायें और बायें हाथ की अंगुलियों का मिलन ही यहाँ बन्धन कहा गया है। तीन खण्डों में यह मिलन होता है। इस तरह से त्रिखण्डा मुद्रा बनती है। प्रकाश और विमर्श स्वरूपिणी १. चित्कला-ग. ने. ज. उ. । २. 'भूत्वा' नास्ति-क. ग. उ. । ३. शान्त्यती- तायाः-ख. घ. च. छ. । ४. शान्तायाः क्रोडीकारात्-ख. घ. च. छ. ।