भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७७ संनिधिकारिणी। अत एवेयं¹ संविद्देवतायास्त्रिपुरायाः संनिधिकारिणी सांनिध्य²- कारिणी। सर्वस्य चक्रराजस्य सर्वेषां चक्राणां पूजायन्त्राणां श्रेष्ठत्वाच्चक्रराजस्य व्यापिका, नवचक्रस्थितनवमुद्राणां समष्टिभूतत्वात् ॥५७-५८॥ सर्वसंक्षोभिणीमुद्राम्राह— योनिप्राचुर्यतः सैषा सर्वसंक्षोभिणी पुनः। वामाशक्तिप्रधानेयं द्वारचक्रे स्थिता भवेत् ॥५९॥ सैषा त्रिखण्डा खण्डत्रयं³मुन्मुच्य योनिप्राचुर्यतः। मध्यमाद्वयसंयोगादेका⁴, अनामिकाद्वयसंयोगादन्या⁵, कनिष्ठिकाद्वयसंयोगादपरा, एवं योनि⁶प्राचुर्यात् सर्व- ⁷संक्षोभिणी परानन्दप्रवणत्वकारिणी। वामाशक्तिप्रधानेयं सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा वामाशक्तिप्रधानत्वात् सृष्टिः। सृष्टिरेव क्षोभः। द्वारचक्रे चतुरस्रत्रयरूपे चतु- र्द्वारवति त्रैलोक्यमोहने ⁸चक्रे स्थिता ॥५९॥ अंगुलियों के मिलन से बनी होने के कारण यह त्रिखण्डा मुद्रा संविद्देवता भगवती त्रिपुरा के सामीप्य को देने वाली है और चक्रराज श्रीयन्त्र के, जो कि समस्त पूजायन्त्रों में सर्व- श्रेष्ठ माना जाता है, समस्त स्वरूप में, सभी नौ चक्रों में व्याप्त होने से व्यापिका कह- लाती है, अर्थात् यह तीन खण्ड वाली त्रिखण्डा मुद्रा समस्त नौ चक्रों में विद्यमान समस्त नौ मुद्राओं की समष्टिस्वरूपिणी है, उन सबमें व्याप्त है ॥५७-५८॥ सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— त्रिखण्डा मुद्रा में जब योनियों की अधिकता हो जाय, तो वह सर्वसंक्षोभिणी कहलाती है। इसमें वामा शक्ति प्रधान है और यह द्वार चक्र में स्थित है ॥५९॥ ऊपर बताई गई त्रिखण्डा मुद्रा अपने तीन खण्डों वाले स्वरूप को छोड़कर जब योनि- प्रचुर हो जाती है, तो इसे सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा कहते हैं। यहाँ दो मध्यमाओं के संयोग से एक, दो अनामिकाओं के संयोग से दूसरी और दो कनिष्ठाओं के संयोग से तीसरी योनि बनती है। इस तरह से इस मुद्रा में योनियों की प्रचुरता रहती है। इसीलिये यह मुद्रा सर्वसंक्षोभिणी है, सभी को परमानन्द की तरफ ले जाने वाली है। इस मुद्रा में वामा शक्ति की प्रधानता रहती है और वामा शक्ति सृष्टि की प्रतीक है। यह सृष्टि ही क्षोभ है। इस तरह से इस मुद्रा का सर्वसंक्षोभिणी नाम सार्थक है। यह मुद्रा त्रैलोक्य- मोहन चक्र में स्थित है, जिसका कि स्वरूप चार द्वार वाली तीन चतुरस्र (चौकोर) रेखाओं से बनता है ॥५९॥ १. 'इयं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'सांनिध्यकारिणी' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ३. मुन्मोच्य-ग. ने. ज. झ. उ. । ४. देका योनिः, अनामा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दन्या योनिः, कनिष्ठा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. योनित्रयप्रा-क. ने. ज. झ. उ. । ७. सर्वसंक्षोभिका-ग. ने. ज. झ. उ. । ८. चक्रे नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।