योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः द्राविणी¹मुद्रामाह— क्षुब्धविश्वस्थितिकरी ज्येष्ठाप्राचुर्यमाश्रिता । स्थूलनादकलारूपा सर्वानुग्रहकारिणी ॥६०॥ सर्वाशापूरणाख्ये तु सैषा स्फुरितविग्रहा । क्षुब्धस्य विश्वस्य स्थितिकरी स्वसंविन्मात्रस्थितिकारिणी । अतो ज्येष्ठा- प्राचुर्यमाश्रिता, ज्येष्ठाशक्तेः स्थितिहेतुत्वात् । ²स्थूलनादकलारूपा । स्थूलनादः, श्रुतिगोचरत्वात् । नादाज्जाताः कला नादकलाः षोडशस्वराः । अत्राभियुक्तवच- नम्— "कलाः कला नादभवा वदन्त्यतः³" (प्र० सा० ७।१८) इत्यादि । ⁴तद्रूपा, कामाकर्षण्यादिनिवाससर्वाशापरिपूरकचक्र⁵पूरकत्वात्, सर्वाशापूरणाख्ये कामा- कर्षिणीकलाधार⁶त्वात् । अत एव सर्वानुग्रहकारिणी । कामाकर्षणमेव सर्वानुग्रहः । द्राविणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— ज्येष्ठा शक्ति की प्रधानता के कारण क्षुब्ध विश्व को स्थिरता देने वाली, स्थूल नाद की १६ कलाओं को धारण करने वाली और सब पर अनुग्रह करने वाली यह द्राविणी मुद्रा सर्वाशापरिपूरक चक्र में अपना स्वरूप प्रकाशित करती है ॥६०-६१॥ क्षुब्ध विश्व को स्थिरता प्रदान करने वाली, अपने संवित् स्वरूप में प्रतिष्ठित करने वाली इस द्राविणी मुद्रा में ज्येष्ठा शक्ति की प्रधानता है, क्योंकि ज्येष्ठा शक्ति ही क्षुब्ध विश्व को स्थिरता प्रदान करती है । कानों से सुनाई पड़ने वाला नाद स्थूलनाद है । इस नाद से उत्पन्न १६ कलाएं ही १६ स्वरों का रूप धारण करती हैं । ¹प्रपंचसार में बताया गया है— "इस मधुर नाद से ही उसकी सोलह कलाओं वाले स्वरों की उत्पत्ति बताई गई है" ॥ यह द्राविणी मुद्रा उन्हीं कलाओं का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि जिस सर्वाशापरिपूरक चक्र में यह निवास करती है, उसमें कामाकर्षिणी आदि १६ शक्तिकलाएँ विद्यमान हैं । इसीलिये यह सब पर अनुग्रह करने वाली है । काम का आकर्षण, इच्छित वस्तु को प्राप्त करा देना ही तो सबका अनुग्रह है । श्लोक में विद्यमान 'सैषा' शब्द से १. 'मुद्रा' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'स्थूल••••गोचरत्वात्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. वदन्त्यजाः-मु. । ४. तद्रूपाः कामाकर्षिण्याद्यास्तद्रूपाः सर्वाशा- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. व्यापकत्वात्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. धाररूपत्वात्- ग. ने. ज. झ. उ. ।
- प्रपंचसार भगवत्पाद शंकराचार्य की कृति मानी जाती है । कलान्यास के प्रसंग का उक्त श्लोक-खण्ड यहाँ उद्धृत किया गया है । इसकी व्याख्या प्रयोगक्रमदीपिका में बताया गया है कि अकार आदि सोलह स्वर नाद की कलाएँ हैं । यहाँ बाद में बिन्दु की सोलह कलाओं का भी निर्देश किया गया है।