भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 130

८० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः सर्वसंक्षोभकारिणि चक्रे स्मृता। स्मृतिः पूर्वानुभवसंस्कारजन्यं ज्ञानम्। पूर्वं चतुःशतीशास्त्रे (३।७-८) अनुभूता मुद्रा¹ इदानीं स्मृता, सवासना कथितत्यर्थः ॥६१-६२॥ सर्वविशंकरीमुद्रामह— व्योमद्वयान्तरालस्थबिन्दुरूपा महेश्वरि ॥६२॥ शिवशक्त्याख्यसंश्लेषाद् दिव्यावेशकरी स्मृता । चतुर्दशारचक्रस्था ²संविदानन्दविग्रहा ॥६३॥ आधाराद्याज्ञान्तषट्चक्रान्तरालानि³ पञ्च व्योमानि। तेषां द्वयोर्द्वयोर्मध्ये एकैको बिन्दुरिति पञ्च बिन्दवः पञ्चभूतमयाः। तदुक्तमभियुक्तैः—"पञ्चबिन्दुमयं भेदं पञ्चप्रणव⁴पञ्जरम्" इति। तद्रूपा व्योमद्वयान्तरालस्थबिन्दुरूपा। शिव- संक्षोभकर चक्र में पुनः याद की गई है। पहले चतुःशतीशास्त्र (३।७-८) में वर्णित इस मुद्रा का यहाँ पुनः स्मरण किया गया है, वासना के साथ उसका पुनः वर्णन किया गया है ॥६१-६२॥ सर्वविशंकरी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— हे महेश्वरि ! दो व्योमों के बीच में स्थित बिन्दु के समान इसका स्वरूप है। शिवात्मक और शक्त्यात्मक अंगुलियों के संयोग से यह बनता है। दिव्य आवेश को प्रदान करने वाली संविदानन्दस्वरूपिणी यह मुद्रा चतुर्दशार चक्र में स्थित है ॥६२-६३॥ आधार से लेकर आज्ञा पर्यन्त छः चक्रों के अन्तराल में पाँच व्योम माने गये हैं। इनमें से दो-दो के बीच में एक-एक बिन्दु स्थित है। ये पाँच बिन्दु पाँच महाभूतों के प्रतिनिधि हैं। जैसा कि किसी अभियुक्त ने कहा है—"यह भेदात्मक संसार पाँच बिन्दुओं के प्रतिनिधि पाँच महाभूतों से बना है और इन पाँच महाभूतों से बना देह पाँच¹ प्रणवों १. 'मुद्रा' नास्ति-ख. ने. झ. ड. । २. सच्चिदा-ग. छ. उ. । ३ बिन्दवः पञ्च- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. पङ्कजम्-ख. ग. ज. झ. ब. उ. ।

  1. स्वच्छन्दतन्त्र के षष्ठ पटल में पाँच प्रणव से युक्त प्राणहंस के उच्चार की विधि बताई गई है। इसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य का प्राणरूपी पक्षी पाँच भूतों के बने इसी देहरूपी पिंजड़े में बन्द रहता है। प्रस्तुत मुद्रा की सहायता से साधक अपने पाँच बिन्दुवाले आध्यात्मिक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो सकता है, अपने प्राणहंस को इस पिंजड़े से मुक्त करा सकता है।