योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८१ शक्त्यात्मसंश्लेषात् । शिवात्मानो दक्षकराङ्गुलयः, शक्त्यात्मानो वामकराङ्गु- लयः । शिवशक्त्यात्मना परिवृत्येतरेतराङ्गुल्यन्तरालप्रवेशितानां सर्वेषामन्योन्य- गाढपरिपीडनादेवंभूता दिव्यावेशकरी मुद्रा दिव्यस्य प्रकाशात्मकशिवस्य, आवेशकरी सामरस्यकरी, चतुर्दशारचक्रस्था चतुर्दशारचक्रे सर्वसौभाग्यदायक- नामधेये स्थिता, ²संविच्छक्तिः, आनन्दविग्रहा परमशिवसामरस्यरूपिणी । कोऽर्थः ? ³उभयकराङ्गुल्यन्तरालगर्तैकैकाङ्गुलिरूपपञ्चबिन्दुमयशवशक्तद्वयसामरस्य - निरूपणलक्षणबन्धनात्मिकेयं मुद्रा संविदैकरस्यानन्दमयो चतुर्दशारचक्रे स्थिते- त्यर्थः ॥६२-६३॥ उन्मादिनीमुद्रामाह— बिन्द्रन्तरालविलसत्सूक्ष्मरूप⁴शिखामयी । ज्येष्ठाशक्तिप्रधाना तु सर्वोन्मादनकारिणी ॥६४॥ का पिंजरा है"। यह मुद्रा भी उक्त आकार वाले पाँच महाभूतों की याद दिलाती है । दाहिने हाथ की अंगुलियाँ शिवात्मक और बायें हाथ की अंगुलियाँ शक्त्यात्मक मानी जाती हैं । शिवात्मक और शक्त्यात्मक इन अंगुलियों को एक-दूसरी अंगुलियों के बीच में फँसा कर सबको पूरी तरह से भींच लेने पर यह आकार बनता है । यह मुद्रा दिव्या- वेशकरी है, अर्थात् शिव के प्रकाशात्मक दिव्य स्वरूप में साधक को समरस कर देती है । सर्वसौभाग्यदायक नाम के चतुर्दशार चक्र में यह स्थित है । यह संवित्स्वरूपिणी मुद्रा शक्ति आनन्दस्वरूपिणी है, परम शिव के साथ साधक को संयुक्त कर देती है । इसका अभिप्राय यह है कि शिवात्मक और शक्त्यात्मक दोनों हाथों की अंगुलियों के बीच में एक-एक अंगुलि को फँसाने से शिव और शक्ति के सामरस्य से समुद्भूत पाँच महाभूतों के प्रतिनिधि के रूप में पंचबिन्दुमयं स्वरूप की जो अभिव्यक्ति होती है, वही इस मुद्रा का स्वरूप है । यह मुद्रा चतुर्दशार चक्र में स्थित है और संवित् के साथ समरसता से उत्पन्न होने वाले आनन्द का अनुभव कराने वाली है ॥६२-६३॥ उन्मादिनी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— दो बिन्दुओं के बीच में से निकली अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाली दो दीप- शिखाओं के सदृश आकृति वाली मुद्रा, जिसमें कि ज्येष्ठा शक्ति का स्वरूप प्रधान १. ल्यन्तरालद्वयगर्तैकैकाङ्गुलिरूपान्योन्यगाढपातनादेवंभूता—ख. ग. ज. झ. उ. । २. सच्चिदानन्द—ग. उ. । ३. 'उभय... मुद्रा' इत्यस्य स्थाने—'शिवशक्तिसामरस्यबिन्दुरूप- लक्षणबन्धनात्मिकेयं मुद्रा' इति पाठः—ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । ४. रेखा—क. ग. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)