योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[८२] योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
दशारचक्रमास्थाय संस्थिता वीरवन्दिते । बिन्द्वन्तरालाद् आधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तर्गतयोनिमहाबिन्द्वोः स्वयम्भुपराख्ययो- र्लिङ्गयोरन्तरालाद् विलसत्सूक्ष्मरूपेशिखामयी^१ विलसन्त्यौ सूक्ष्मरूपे बिसतन्तु- निभाकृती शिखेव शिखावत् शिखे अम्बिकाशान्तयोस्तन्मयी तदैकरस्यरूपा । ज्येष्ठाशक्तिप्रधाना ज्येष्ठाशक्तिप्रचुरा । सर्वोन्मादनकारिणी । “उन्मादश्चित्त- विभ्रमः” (अ० को० १।७।२६) । सर्वानुन्मत्तवत् ^२सर्वव्यापारपराङ्मुखान् शिव- शक्तिसामरस्याऽनुसन्धानपरान् करोतीत्यर्थः । दशारचक्रमास्थाय दशारचक्रं बहिर्दशारचक्रम् । वीरवन्दिते । इदन्तारिपोरहमि ^३समराङ्गणे प्रलयप्रतिपादन- परा वीराः, तैर्वन्दिते आत्माहम्भावनया भाविते । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति । है, सबको उन्मत्त कर देनेवाली है। हे वीरवन्दिते ! यह मुद्रा बहिर्दशार चक्र में अधिष्ठित है ॥६४-६५॥ बिन्द्वन्तराल, अर्थात् आधार और ब्रह्मरन्ध्र में स्थित योनि और महाबिन्दु में विद्य- मान स्वयंभू और पर लिंग के बीच में से निकली कमलनाल के सूक्ष्म तन्तुओं के समान आकृति वाली दीपशिखाओं के समान जब अम्बिका और शान्ता शक्ति का स्वरूप समरस हो जाता है और ज्येष्ठा शक्ति का स्वरूप प्रधान हो जाता है, तो इससे निष्पन्न उन्मा- दिनी मुद्रा सबको उन्मत्त बना देती है। चित्त के विभ्रम को उन्माद कहते हैं। यह मुद्रा सबको पागल बना देती है, साधक को सभी लौकिक व्यवहारों से विमुख कर शिव और शक्ति की समरसता की खोज में लगा देती है। दशार चक्र से यहाँ बहिर्दशार का ग्रहण किया जाता है। वीर शब्द का अर्थ है इदन्ता (भेद-दृष्टि) रूपी शत्रु के साथ युद्ध कर उसको अहं (अभेद दृष्टि) में लीन कर देने वाला। भेददृष्टि पर विजय प्राप्त करने वाले वीर भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अपनी आत्मा के रूप में भावना करते हैं, अतः वह ‘वीर- वन्दिते’ पद से संबोधित की गई है। उक्त स्थिति का वर्णन ^१परापंचाशिका में भी किया गया है—
१. रेखा-क. ग. । २. स्वस्व-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. रणाङ्गणे-ने. ज. झ. उ. । १. इस ग्रन्थ का प्रकाशन अनुत्तरप्रकाशपञ्चाशिका के नाम से काश्मीर ग्रन्थमाला ग्रन्थ संख्या १२ के ग्रन्थ षट्त्रिंशत्तत्त्वसन्दोह के साथ हुआ है। इस ग्रन्थ का परिष्कृत संस्करण अपेक्षित है। शिवपुराण कैलाशसंहिता (१६।७०-८४) के श्लोकों से भी इस ग्रन्थ के परिष्कार में सहायता ली जा सकती है।