भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८३ कोऽर्थः ? अन्तः कुलाकुलबिन्दुद्वयान्तरालविलसदम्बिकाशान्ताख्यवह्न्य- मृतकुण्डलिनीरूपशिखाद्वयसदृशा ^१ शक्तिशिवाख्य^२करद्वयमध्यमाऽङ्गुष्ठद्वयसंयोग- बिन्दुद्वयाकारवर्तुलद्वयान्तर्गतकनिष्ठिकाद्वयमयी ज्येष्ठाशक्तिप्रधानत्वाद् ऋज्वाकृत्य- नामातर्जनीद्वयाग्रसंयोगरूपा शिवशक्तिसामरस्यानुसन्धानलक्षणबन्धनरूपा सर्वो- न्मादिन्याख्या मुद्रा बहिर्दशारचक्रमास्थाय स्थितेत्यर्थः ॥६४-६५॥ महाङ्कुशमुद्रामाह— वामाशक्तिप्रधाना तु महाङ्कुशमयी पुनः ॥६५॥ ^३तद्वद् विश्वं वमन्ती सा द्वितीये तु दशारके । संस्थिता मोदनपरा मुद्रारूपत्वमास्थिता ॥६६॥ बिन्द्वन्तरालविलसत्सूक्ष्म^४रूपशिखामयी ऋज्वाकृतितर्जन्यनामिकासंयोगरूपा ^५ज्येष्ठाशक्तिप्रधाना पूर्वं भवति। इदानीं वामाशक्तिप्रधाना, “वामा विश्वस्य

इदन्ता रूपी शत्रु का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले स्व-स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। पूर्वोक्त ग्रन्थ का अभिप्राय यह है—शरीर के भीतर कुल और अकुल नामक दो बिन्दुओं के बीच में अम्बिका और शान्ता नाम की वह्नि और अमृत कुण्डलिनियाँ विराज- मान हैं। इन कुण्डलिनियों से निकली दो सूक्ष्म दीपशिखाओं के समान ही यहाँ शक्ति और शिव नामक दो हाथों की दो मध्यमाओं और दोनों अंगुष्ठों के संयोग से दो बिन्दुओं का आकार बनता है। इन दो वर्तुलां के बीच में दोनों कनिष्ठिकाओं के संयोजन से उन्मा- दिनी मुद्रा का आकार बनता है। इसमें अनामा और तर्जनी अंगुलियाँ सीधी रहती हैं, अतः इसमें ज्येष्ठा शक्ति की प्रधानता रहती है। इस सर्वोन्मादिनी मुद्रा का बन्धन शिव और शक्ति के सामरस्य की खोज के लिये किया जाता है। यह बहिर्दशार चक्र में स्थित है ॥६४-६५॥ महांकुश मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— महांकुश मुद्रा में वामा शक्ति की प्रधानता है। वामा शक्ति के समान ही विश्व की सृष्टि में लगी यह मुद्रा द्वितीय दशार में स्थित है। मोदन व्यापार में प्रवृत्त होकर इसने मुद्रा का रूप धारण किया है ॥६५-६६॥ कुल और अकुल बिन्दुओं के बीच में स्थित वह्नि और अमृत कुण्डलिनियों से निकली दीपशिखाओं के समान आकृतिवाली मुद्रा का ऊपर वर्णन किया गया है। उसमें तर्जनी और अनामिका की आकृति सीधी रहती है, इसीलिये उसमें ज्येष्ठा शक्ति प्रधान मानी

१. 'शिखाद्वयसदृशा' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । २. ख्याद्वय-ने. ज. झ. उ. । ३. अधो-क. ग. ने. छ. ज. झ. उ. । ४. रेखा-क. ख. । ५. वामाशक्तिप्रधाना न भवति किन्तु तर्जन्यनामिकासंयोगरूपा न भवति-क. ने. ज. झ. उ. ।