भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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८४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः वमनादङ्कुशाकारां गता" (१।३७) इति पूर्वोक्तरीत्या वामाशक्तिप्रधानत्वाद् वक्राकारतर्जनीबन्धनरूपा विश्वं वमन्ती², सृष्टिरूपत्वात् । तद्वत् परमशिववत् । द्वितीये तु दशारके अन्तर्दशारे । मोदनपरा परशिवसामरस्यलक्षणपरानुसन्धानमयी, अत एव मुद्रारूपत्वमास्थिता । अयमर्थः—पूर्वोक्तमुद्रालक्षणविमर्शनमयचिच्छक्तिरेव ³वामाशक्तिभूततर्जनीद्वयमयपरशिवसामरस्यपरानन्दप्रवणरूपा महाङ्कुशमुद्रा⁴- ऽन्तर्दशारे स्थितेति ॥६५-६६॥ खेचरीमुद्रामाह— धर्माधर्मस्य संघट्टादुत्थिता विँत्तिरूपिणी । विकल्पोत्थक्रियालोपरूपदोषविघातिनी ॥६७॥ विकल्परूपरोगाणां हारिणी खेचरी परा । सर्वरोगहराख्ये तु चक्रे संविन्मयी स्थिता ॥६८॥ गई है। यही मुद्रा जब वामा शक्ति प्रधान हो जाती है, अर्थात् तर्जनी अंगुलि का आकार तिरछा हो जाता है, तो यह महांकुश मुद्रा कहलाती है। पहले (१।३७) यह बताया जा चुका है कि विश्व का वमन करने के कारण वामा शक्ति अंकुश के जैसा तिरछा आकार ग्रहण कर लेती है। सृष्टि स्वरूप वामा शक्ति की प्रधानता के कारण यह मुद्रा भी परम शिव के समान ही विश्व की सृष्टि में समर्थ है। यह अन्तर्दशार चक्र में स्थित है। परमशिव के सामरस्य स्वरूप के अनुसन्धान में लगी होने से यह जीवों में आनन्द की अभिव्यक्ति करती है और इसीलिये मुद्रा का स्वरूप धारण करती है। इसका अभि- प्राय यह है कि ऊपर बताए गये लक्षण वाली उन्मादिनी नामक विमर्शमय चित्-शक्ति ही जब वामा शक्ति स्वरूप तर्जनीद्वयमय परम शिव के साथ सामरस्य रूपी परमानन्द में लीन हो जाती है, तो अन्तर्दशार चक्र में स्थित महांकुश मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है ॥६५-६६॥ खेचरी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— धर्म (शक्ति) और अधर्म (शिव) के सामरस्य से उत्पन्न, संवित्स्वरूपा, विकल्प (असावधानी) के कारण नित्य, नैमित्तिक आदि कृत्यों के लोप से उत्पन्न दोषों को दूर करने वाली, विकल्पात्मक रोगों का नाश करने वाली खेचरी मुद्रा सर्व- श्रेष्ठ मानी जाती है। संविन्मयी यह मुद्रा सर्वरोगहर नामक चक्र में स्थित है ॥ ६७-६८ ॥ १. मुपाश्रिता—ग ने. उ. । २. वमन्ती स्थिता—ख. ज. झ. । ३. वामाप्राधान्याद् व्यक्तोभतेत्यर्थः । तेनाद्वयपर—ख. ग. ज. झ. उ. । ४. मुद्राख्याऽन्त—क. ख. ग. ज. झ. उ. । ५. वित्ति—ज. उ. ।