योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८५ धर्माधर्मस्य संघट्टात् । धर्मः शक्तिः, सृष्ट्यादिसकलधर्मपरत्वात् । अधर्मः शिवः, तत्तत्सकलधर्मरहितत्वात् । तयोः संघट्टः सामरस्यम्, तस्मादुत्थिता । वित्ति१रूपिणी । वित्तिः२ संवित्तिः । विकल्पोत्थक्रियालोपरूपदोषविघातिनी । विकल्पः कोटिद्वयावलम्बनम् एवं वा न वेति संशयज्ञानम्, विकल्पोत्थाः क्रिया नित्यनैमित्तिककाम्यरूपाः, तल्लोपेन ३प्रत्यवायः प्रायो जायते, तस्य विघातिनो । विकल्परूपरोगाणां हारिणी । परिपूर्णभावस्य शिवस्य मयैवमेतत्कर्तव्यं न वेति विकल्परूपा रोगा आधय एव व्याधयः, तदुक्तमभियुक्तैः—“अपूर्णम्मन्यता व्याधिः कार्पण्यैकनिदानभूः । क्लेशावहोऽ४तिकष्टश्च” इति, तेषां हारिणी खेचरी— धर्म शक्ति को कहते हैं, क्योंकि सृष्टि, स्थिति आदि समस्त धर्म उसी से प्रवृत्त होते हैं। अधर्म शिव है, क्योंकि वह सकल धर्मों से अतीत है। इन दोनों के सामरस्य से उठी संवित्ति समस्त प्रत्यवायों का नाश कर देती है। 'यह ऐसा है या नहीं' इस तरह से दो कोटियों का सहारा लेने वाला संशयात्मक ज्ञान यहाँ विकल्प के नाम से कहा गया है। इस संशयात्मक ज्ञान के कारण नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों का लोप होने पर प्रत्यवाय (दोष) लगता है। इस तरह के सारे दोषों (विघ्नों) का नाश इस मुद्रा के प्रदर्शन से हो जाता है। जीव परिपूर्ण रूप से शिव ही है, किन्तु अपने इस स्वरूप का बोध न रहने से मुझे ऐसा करना चाहिये या नहीं, इस तरह के नाना प्रकार के विकल्प (संशय) रूपी रोग उसके तन और मन को घेर लेते हैं। १भट्ट गंगाधर मिश्र ने ठीक ही कहा है— अपने को अपूर्ण मानना सब से बड़ा रोग है। इससे व्यक्ति की स्थिति दयनीय हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को नाना प्रकार के क्लेश घेर लेते हैं, जो कि उसको बहुत कष्ट देते हैं॥ खेचरी मुद्रा इन सब विकल्पों को दूर भगा देती है। स्वयं ग्रन्थकार ने २चिद्विलास स्तव में कहा है— १. चिति-ज. उ. । २. चितिः-ज. उ. । ३. पापं जायते-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. जुगुप्सश्च-मु. । १. भट्ट गंगाधर मिश्र और उसके किसी स्तोत्र ग्रन्थ का उल्लेख ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९, ८०, १३४) में हुआ है। इसके दो श्लोक दीपिका में भी अभियुक्त वचन करके उद्धृत हैं। ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९) के प्रमाण पर हमने यहाँ उनका नाम दे दिया है। २. चिद्विलास स्तव का भी अनेक हस्तलेखों तथा मुद्रित प्रति के आधार पर किया गया परिष्कृत संस्करण नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० ३२२-३३०) में प्रका- शित हो चुका है। एक हस्तलेख में अमृतानन्द के गुरु पुण्यानन्द को इसका कर्ता माना गया है। परन्तु इस सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक बात नहीं कही जा सकती (द्र० पृ० १७)