योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेत खे निरस्तसकलक्रियाक्रमे या चितिश्चरति शाश्वतोदया२ । सा शिवत्वसमवाप्तिकारिणी खेचरी ३सकलखेदहारिणी ॥ (चि० ३८) इति मदुक्तरीत्या निर्विकल्पबोधभूमिसंचारिणी चितिः चिच्छक्तिः परमशिवसाम- रस्यरूपा तदधिष्ठितत्वात् सर्वरोगहराख्ये चक्रे संविन्मयी स्थिता । कोऽर्थः ? शिव- शक्तिमयदक्षवामबाहुद्वयपरिवर्तनरूपतर्जनीद्वयावलम्बितव्यत्यस्तकरद्वयकनिष्ठाना- मिकाद्वन्द्वतदुपरिस्थितमध्यमाद्वयाग्रसंयुक्ताङ्गुष्ठद्वयाग्रसंयोजनलक्षणबन्धनरूपा शिवशक्तिद्वयसंघट्टादुत्थिता परा निर्विकल्पबोधभूमिसंचारिणी, अत एव विकल्प- जनितनित्यनैमित्तिककाम्यकर्मलोपरूपदोषविघातिनी, अत एव च विकल्परूप- रोगाणामपूर्णम्मन्यतालक्षणानां हारिणी सर्वरोगहराख्ये चक्रे खेचरी मुद्रा स्थितेत्यर्थः ॥६७-६८॥ बीजमुद्रामाह — शिवशक्तिसमाश्लेषस्फुरद्व्योमान्तरे पुनः । प्रकाशयन्ती विश्वं सा सूक्ष्मरूपस्थितं सदा ॥६९॥ कर्मकाण्ड का सारा प्रपंच जहाँ विलीन हो गया है, उस ज्ञानगगन में जो चिति शक्ति सदा प्रकाशमान होकर चलती है, उसी को खेचरी कहते हैं। यह समस्त क्लेशों का नाश करने वाली और शिवत्व की प्राप्ति में सहायता करने वाली है। निर्विकल्प बोधभूमि (ज्ञानगगन) में संचरण करने वाली चिति शक्ति सदा परम शिव के साथ समरस होकर रहती है। अतः परम शिव के द्वारा अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र में भी यह संवित्स्वरूपिणी मुद्रा के रूप में स्थित है। इसका अभिप्राय यह है कि दाहिना और बांया हाथ क्रमशः शिव और शक्ति का प्रतीक है। दाहिने हाथ को बाँई तरफ और बायें हाथ को दाहिनी तरफ करके दोनों तर्जनियों से एक-दूसरे हाथ की कनिष्ठा और अनामिका को पकड़ कर और उसके ऊपर दोनों मध्यमाओं के अग्रभाग से दोनों अंगूठों के अग्रभाग को मिलाने से इस मुद्रा का स्वरूप बंधता है। इस तरह से शिव और शक्ति दोनों के संघट्ट से निर्विकल्प बोधभूमि में संचरण करने वाली यह परम उत्कृष्ट मुद्रा निष्पन्न होती है। इसीलिये यह विकल्पजन्य नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों के लोप से उत्पन्न होने वाले दोषों का नाश कर डालती है और इसीलिये विकल्प ज्ञान से उत्पन्न अपूर्ण- मन्यता आदि रोगों को भी दूर करने वाली है। यह खेचरी मुद्रा सर्वरोगहर नामक चक्र में स्थित है ॥६७-६७॥ बीज मुद्रा का वर्णन करते हैं— शिव और शक्ति के सामरस्य के बीच में स्फुरित हो रहे सूक्ष्म गगन में निखिल भुवन को सूक्ष्म रूप से सदा प्रकाशित करने वाली