योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८७ बीजरूपा महामुद्रा सर्वसिद्धिमये स्थिता । शिवशक्त्योः समाश्लेषः सामरस्यं तन्मध्ये स्फुरद्व्योमान्तरे प्रकाशविमर्श२रूप- सूक्ष्मतरगगनान्तराले । सूक्ष्मरूपस्थितं कारणतावन्मात्रतया स्थितम् । विश्वं सदा सर्वदा ३प्रकाशयन्ती, अत एव बीजरूपा महामुद्रा, तस्या ४भाविचराचररूप- विश्वोत्पत्तिहेतुत्वात् । सर्वसिद्धिमये विश्वोत्पत्तिहेतुभूतबीजमुद्राधारत्वात् सर्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य सिद्धिरुत्पत्तिः, तदुक्तं५ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू. १) इति, तन्मये चक्रे स्थिता । कोऽर्थः ? शिवशक्तिसंज्ञितो- भयकरव्यत्यस्तकनिष्ठिकाद्वयाग्रावलम्बनवक्रोभयानामिकोभयपार्श्वप्रसृतसंयुक्ताग्र- मध्यमाद्वयोपरिस्थितवक्राकारतर्जन्यङ्गुष्ठयुगलाग्रसमाश्लेषान्तरालप्रतीयमानगग- नान्तराले कारण१तावन्मात्रतया स्थितं विश्वं प्रकाशयन्ती बीजमुद्रा सर्व- सिद्धिमयाभिधे चक्रे स्थितेत्यर्थः ॥६९-७०॥ सूक्ष्म कारण के रूप में स्थित विश्व का सदा प्रकाश करने वाली यह बीज स्वरूपिणी महामुद्रा सर्वसिद्धिमय चक्र में स्थित है । ६९-७०॥ शिव और शक्ति का समाश्लेष ही सामरस्य है। इस सामरस्य में प्रकाश और विमर्श- रूप सूक्ष्म बोधगगन शोभायमान है । इसमें सूक्ष्म कारणतन्मात्रा के रूप में सारा जगत् विद्यमान है । बीज रूप में स्थित इस विश्व को यह सदा प्रकाशित करती है । इसलिये इसको बीज रूप महामुद्रा कहते हैं । आगे बनने वाले चर और अचर सारे जगत् की उत्पत्ति इसी से होती है । यह मुद्रा सर्वसिद्धिमय चक्र में स्थित है । विश्व की उत्पत्ति में कारणभूत बीजमुद्रा का आधार होने से इस चक्र से शिव से लेकर भूमि पर्यन्त सारे जगत् की सिद्धि (उत्पत्ति) होती है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चिति शक्ति स्वतन्त्र रूप से विश्व की सिद्धि (उत्पत्ति) में कारण है" ।। इस तरह से सारे जगत् की उत्पत्ति करने वाले सर्वसिद्धिमय चक्र में यह मुद्रा स्थित है । इसका अभिप्राय यह है कि शिव और शक्ति संज्ञा वाले दोनों हाथों को अदल-बदल कर दोनों कनिष्ठिकाओं के अग्रभाग को दोनों तिरछी अनामिकाओं से पकड़ कर और उसकी दोनों तरफ दोनों मध्यमाओं के अग्रभाग को संयुक्त करने के बाद उन दोनों के ऊपर तर्जनियों और अंगूठों को तिरछा रखने पर बीच में जो खाली जगह दिखाई पड़ती है, इस सूक्ष्म तन्मात्रारूप कारण में स्थित विश्व का प्रकाश करने वाली यह बीजमुद्रा सर्वसिद्धिमय नामक चक्र में स्थित है ॥६९-७०॥ १. तन्मये-ग. ज. झ. उ. । २. 'रूप' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ३. प्रकाशा- यन्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. 'भावि' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'तदुक्तमीश्वर- प्रत्यभिज्ञायाम्' इति पाठः-ग. ज. झ. उ. ।