योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः योनिमुद्रामाह— सम्पूर्णस्य प्रकाशस्य लाभभूमिरियं पुनः ॥७०॥ योनिमुद्रा कलारूपा सर्वानन्दमये स्थिता । सम्पूर्णस्य प्रकाशस्य प्रकाशात्मनः परशिवस्य । लाभभूमिः प्राप्तिस्थानम् । अत एव ^१इयं योनिमुद्रा, योनिरूपा मुद्रा योनिमुद्रा, योनिस्त्रिकोणम् । वामा- दीच्छादिशक्तित्रितयसामरस्यरूपा^२न्तस्त्रिकोणान्तरालरूपिणी । कलारूपा हार्द्ध- कलात्मकविमर्श^३शक्तिरूपा । अत एव सर्वानन्दमये शिवशक्तिसामरस्यसमुदित- परानन्दलक्षण^४परमबिन्दुरूपसर्वानन्दमयनाम्नि चक्रे स्थिता । कोऽर्थः ? वामेच्छा- रूपवक्रतर्जनीद्वयाग्रगृहीतव्यत्यस्तानामिकाद्वयाग्रपरिगतज्येष्ठाज्ञानमय^५ऋजुसंयुक्ता- ग्रमध्यमाद्वयमध्यगतरौद्रीक्रियात्मककनिष्ठिकाग्रयोजितसम्पूर्णप्रकाशरूपाङ्गुष्ठद्वया- ग्ररूपा ^६विमर्शकलारूपमयी योनिमुद्रा प्रकाशविमर्शसामरस्यलक्षण^७परबिन्दुमय- सर्वानन्दमये स्थितेत्यर्थः ॥७०-७१॥ अब योनिमुद्रा का वर्णन करते हैं— सम्पूर्ण प्रकाश, परम शिव की प्राप्ति का स्थान यह योनिमुद्रा ही है। कामकलास्वरूपिणी यह मुद्रा सर्वानन्दमय चक्र में स्थित है ॥७०-७१॥ सम्पूर्ण प्रकाश, अर्थात् प्रकाशात्मक परम शिव की प्राप्ति का स्थान यह योनिमुद्रा ही है। यह मुद्रा योनिरूपा है। यहां योनि का अर्थ त्रिकोण है। इस मुद्रा का आकार भी वैसा ही है। वामा आदि और इच्छा आदि तीन-तीन शक्तियों के सामरस्य से बने मध्यत्रिकोण के अन्तराल सरीखा इसका रूप है। यह मुद्रा हार्द्ध(काम)कलात्मक विमर्श शक्ति का अवतार है। इसीलिये यह सर्वानन्दमय चक्र में स्थित है। शिव और शक्ति के सामरस्य से उत्पन्न परमानन्द को लक्षित कराने वाला परम बिन्दु (त्रिकोणमध्यगत बिन्दु) ही सर्वानन्दमय चक्र है। इस चक्र में योनिमुद्रा स्थित है। इसका सार यह है कि वामा और इच्छा शक्ति स्वरूप दोनों तिरछी तर्जनियों से अलग-अलग दोनों अनामिकाओं को पकड़ना चाहिये । इन अनामिकाओं के ऊपर ज्येष्ठा और ज्ञान शक्तिमय मध्यमा अंगुलियों को सीधी रखना चाहिये और इनके बीच में रौद्री और क्रियाशक्ति स्वरूपिणी कनिष्ठिकाओं को रखना चाहिये। सबसे आगे प्रकाशमय दोनों अंगुष्ठों का संयोजन करने से विमर्श कला स्वरूपिणी योनिमुद्रा का आकार बनता है। यह मुद्रा प्रकाश-विमर्श के सामरस्य के प्रतीक परबिन्दु स्वरूप सर्वानन्दमय चक्र में स्थित है ॥७०-७१॥ १. ‘इयं’ नास्ति-ख. ज. झ. उ. । २. रूपा त्रिकोणरूपिणी-ख. ग. ज. झ. उ. । ३. शक्तिः-ख. । ४. ‘परम’ नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. ‘विमर्शकलारूपमयी’ इति पाठोऽत्राधिकः-गं. उ. । ६. नास्ति-गं. उ. । ७. ‘पर’ नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. ।