योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८९ उपसंहरति— क्रियाचैतन्यरूपत्वादेवं चक्रमयं स्थितम् ॥७१॥ क्रिया, “क्रियाशक्तिस्तु विश्वस्य मोदनाद् द्रावणात् तथा” (१।५७) इत्युपक्रान्ता क्रियाशक्तिरेव भेदेन विरचनामयी वामादिशक्तिप्राधान्यभेदात् संक्षोभिण्यादि- योन्यन्ततत्तन्मुद्रारूपेण, चैतन्यरूपत्वात् चक्रमयं त्रैलोक्यमोहनादिसर्वानन्दमयान्त- नवचक्रमयं स्थितमित्यर्थः ॥७१॥ ननु “यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी” (१।९) इत्युपक्रान्तम्, कथं पुनः “क्रियाचैतन्यरूपत्वादेवं चक्रमयं स्थितम्” (१।७१) इत्युपसंह्रियते ? इत्याशङ्क्य¹ तर्हि महान् प्रकृतोपसंहारस्त्वयमित्याह— इच्छारूपं परं तेजः सर्वदा भावयेद् बुधः । मुद्रा प्रकरण का अब उपसंहार होता है— इस तरह से मुद्रा स्वरूपिणी क्रिया शक्ति ही चैतन्य (संवित्) का रूप धारण कर चक्रमय बन जाती है ॥७१॥ ‘क्रियाशक्तिस्तु’ इत्यादि श्लोक से मुद्रा का प्रसंग प्रारम्भ होता है । इस तरह से क्रिया शक्ति ही अंगुलियों की विभिन्न स्थितियों के माध्यम से वामा प्रभृति शक्तियों की प्रधानता आदि के आधार पर संक्षोभिणी से लेकर योनि पर्यन्त मुद्राओं का स्वरूप धारण करती है । इन्हीं के साथ ज्ञानशक्ति चैतन्य का स्वरूप, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन से सर्वा- नन्दमय पर्यन्त चक्रों का स्वरूप धारण कर लेती है । इसका अभिप्राय यह है कि क्रिया शक्ति नौ मुद्राओं का स्वरूप धारण करती है और ज्ञानशक्ति नौ चक्रों का । इस तरह से उक्त दोनों शक्तियों की सहायता से श्रीचक्र का परिपूर्ण स्वरूप बनता है ॥७१॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि ‘यदा सा परमा’ इत्यादि श्लोक से इस प्रकरण का प्रारम्भ होता है, जिसमें कि परम शक्ति का विश्व रूप में विस्तार बताया गया है, अब उपसंहार में भी परम शक्ति की ही चर्चा होनी चाहिये, उसके स्थान पर यहाँ क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति से मुद्रा और चक्र की सृष्टि का उल्लेख हो रहा है, ऐसा क्यों ? इसी प्रश्न का उत्तर आगे दे रहें हैं कि यह एक लम्बा प्रकरण है । ऊपर अवान्तर प्रकरण का उप- संहार बताया गया है, लम्बे प्रकरण का उपसंहार आगे इस तरह से बताया जा रहा है— परम ज्योति इच्छा शक्तिमय है, बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह उसी की भावना करे ॥ १. शङ्कायाम्—ख. ग. ङ. ।