योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः परं तेजः शिवशक्तिसामरस्यरूपपरामयं ज्योतिः । इच्छारूपं स्वेच्छागृहीत१- नानानामरूपप्रपञ्चमयम् । सर्वदा कालत्रयेऽपि । भावयेद् बुधः साक्षात् पर शिवरूप- निजगुरुकटाक्षपातेन । घृणा शङ्का भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पञ्चमी । कुलं शीलं च जातिश्चेत्यष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्त२परिपाटितपाशाष्टकतया परिस्फुरत्परशिवाहंभावः स्वेच्छाकल्पितनाना३नामरूपप्रपञ्चमयं श्रीचक्ररूपेण परिणतं परामयं तेजः सर्वदा भावयेदित्यर्थः । पुनरस्यैव चक्रस्य प्रकारान्तरेण वासनान्तरमाह— त्रिधा च नवधा चैव चक्रसंकेतकः पुनः ॥७२॥ स्पष्टम् ॥७२॥ पर तेज शिव और शक्ति के सामरस्य से उद्भूत परम प्रकाश को कहते हैं। यह पर तेज अपनी इच्छा से मुद्रा, चक्र आदि अनेक नामों और आकारों को धारण कर लेता है। विद्वान् साधक को चाहिये कि वह इसी तेजोमय रूप का सदा तीनों कालों में ध्यान करे । किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने कहा है— घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील, और जाति—ये आठ प्रकार के पाश होते हैं ।। परम शिव के प्रतिनिधि अपने गुरु की कृपादृष्टि प्राप्त कर लेने पर साधक के उक्त आठों पास टूट जाते हैं और उसमें 'मैं ही परशिव हूँ' इस तरह की प्रतीति जाग उठती है। ऐसे व्यक्ति को भी चाहिये कि वह अपनी इच्छा से नाना नाम और रूपमय प्रपंच को धारण करने वाले परम तेज को ही श्रीचक्र के रूप में परिणत जानकर उसकी उपासना करे ।। फिर इसी चक्र की दूसरे प्रकार की भावना बताते हैं— यह चक्रसंकेत पुनः त्रिधा और नवधा विभक्त होता है ॥७२॥ इसका अर्थ स्पष्ट है। अभिप्राय यह है कि यह श्रीचक्र कामेश्वर-कामेश्वरी की संकेत भूमि है, अर्थात् उनका यहाँ मिलन होता है। इस युगलस्वरूप के साक्षात्कार के अनेक उपाय पहले बताये गये हैं। अब पुनः यहाँ बताया जा रहा है कि उस युगलस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिये इस श्रीचक्र की त्रिविध और नवविध भावना करनी चाहिये ॥७२॥ १. कृतनानारूप—ख. ग. झ. उ. । २. नरीत्या पाटित—क. ख. ग. ने. । ३. 'नाम' नास्ति—ख. ग. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक कुलार्णवतन्त्र (१३।९०) में उपलब्ध है। अमृतानन्द यहाँ कुलार्णव का नाम न लेकर इसको किसी अभियुक्त व्यक्ति का वचन मानते हैं। पृ० ९ की टिप्पणी देखिये।