भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९१ तत्रादौ त्रिधात्ववासनामाह— वह्निनैकेन शक्तिभ्यां द्वाभ्यां चैको१ऽपरः पुनः । तैश्च वह्नित्रयेणापि शक्तीनां त्रितयेन च ॥७३॥ पद्मद्वयेन चान्यः स्याद् भूगृहत्रितयेन च । पञ्चशक्तिचतुर्वह्निपद्मद्वयमहीत्रयम् ॥७४॥ २परिपूर्णं महाचक्रं एकेन वह्निना द्वाभ्यां शक्तिभ्यामेकः प्रकारः । तैश्च एकवह्निशक्तिद्वयरूपै- ३स्त्रिकोणत्रयैः पुनर्वह्नित्रयेण शकीनां त्रितयेन चापरः प्रकारः । अयमर्थः—त्रिको- णानामेवोपरि विस्तारक्रमेण पुनर्वह्नित्रयेण शक्तित्रयेण४ च जायतेऽयमेकः प्रकारः । पद्मद्वितयेन भूगृहत्रितयेन चान्यः प्रकारः । पद्मद्वय(यं) ५वृत्तत्रयान्तरालयोरष्टदलं षोडशदलं चेति । भूगृहत्रितयं चतुरस्रत्रयम् । एवं कृते सति पञ्च शक्तयश्चत्वारो वह्नयः पद्मद्वयं महीत्रयं चेति परिपूर्णं महाचक्रं समष्टिरूपम् ॥७३-७५॥ इनमें से पहले त्रिविध भावना का उपदेश करते हैं— पहले प्रकार में एक वह्नि और दो शक्तियों की भावना की जाती है । उनके साथ तीन वह्नि और तीन शक्तियों को मिला कर दूसरे प्रकार की भावना की जाती है । दो पद्मों और तीन भूगृहों को मिलाकर तीसरी भावना बनती है । इस तरह पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और तीन भूगृहों को मिलाने से यह श्रीचक्र परिपूर्ण हो जाता है ॥७३-७५॥ एक वह्नि और दो शक्तियों के संयोग से पहला प्रकार बनता है । अर्थात् श्रीचक्र की इस पहली भावना में बिन्दु, त्रिकोण और वसुकोण की भावना की जाती है । एक वह्नि और दो शक्तियों से निष्पन्न इन तीन त्रिकोणों के साथ फिर तीन वह्नि त्रिकोणों और तीन शक्ति त्रिकोणों के संयोग से दूसरा प्रकार बनता है । इसका भाव यह है कि उक्त तीन संख्या के त्रिकोणों के ऊपर ही पुनः तीन शक्ति त्रिकोणों और वह्नि त्रिकोणों का विस्तार होने पर भावना का दूसरा आधार तैयार हो जाता है । इसमें अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार चक्र की भावना की जाती है । पद्मद्वय और भूगृहत्रय से तीसरा प्रकार बनता है । तीन वृत्तों अर्थात् वृत्ताकार घेरों के बीच में अष्टदल और षोडश दल ये दो पद्म बनते हैं । भूगृहत्रय शब्द से तीन चतुरस्रों का ग्रहण होता है । इस तरह से इस तीसरे प्रकार में अष्टदल, षोडशदल और चतुरस्र चक्र की भावना की १. चैकः परः—ख. ग. घ. ज. झ. । २. इति पूर्णं—ख. ग. च. छ. ज. झ. उ. । ३. स्त्रिकोणैः—ख. ग. ज. झ. उ. । ४. शक्तित्रये जातेऽपरः प्रकारो भवति—ख. ने. ज. झ. । ५. वृत्तत्रयान्तराले—ख. ग. च. ज. झ. उ. ।