योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तत्प्रकारत्रयमेव विविच्य विवृणोति— तत्प्रकारः प्रदर्श्यते । तत्राद्यं नवयोनि स्यात् तेन द्विदशसंयुतम् ॥७५॥ मनुयोनि परं विन्द्यात् तृतीयं तदनन्तरम् । अष्टद्व्यष्टदलोपेतं चतुरस्रत्रयान्वितम् ॥७६॥ जातावेकवचनम् । तत्प्रकाराः प्रदर्श्यन्त इत्यर्थः । तत्र तेषु प्रकारेषु । आद्यं नवयोनि । वह्निनाैकेन शक्तिभ्यां द्वाभ्यामित्यस्य विवरणम् । एकस्य वह्नेर्द्वयोः शक्त्योश्च संयोगे सति बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणैर्नवयोनिचक्रं १भवतीत्यर्थः । तेन द्विदशसंयुतं मनुयोनि परं विन्द्यात् । तेन नवयोनिचक्रेण२ । द्विदशसंयुतं दशारद्वय- संयुतम् । मनुयोनि चतुर्दशकोणम् । परं द्वितीयं जानीयात् । ३तेन वह्नित्रये शक्तित्रये च कृते सति दशारचक्रद्वयं चतुर्दशारचक्रं च चक्रत्रितयं द्वितीयं चक्रं भवतीत्यर्थः । तदनन्तरमष्टद्व्यष्टदलोपेतं चतुरस्रत्रयान्वितम् । ४तेन चक्रद्वयेनान- जाती है। इन तीन प्रकार की भावनाओं में पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और महीत्रय (चतुरस्रत्रय) से निष्पन्न यह महाचक्र (श्रीचक्र) परिपूर्ण हो जाता है॥७३-७५॥ इन्हीं तीनों प्रकारों को और अधिक स्पष्ट करते हैं— इस त्रिविध भावना की विधि अब बताते हैं। पहला प्रकार नवयोनि पर्यन्त चक्र का है। दूसरा दो दशारों और चतुर्दशार का है। इसके बाद तीसरा प्रकार अष्टदल, षोडश दल के साथ चतुरस्रत्रय के मिलने से बनता है ॥७५-७६॥ प्रकार शब्द में एकवचन जाति का सूचक है। इसका अर्थ होगा विविध जाति का प्रकार, अर्थात् अनेक प्रकार। यहाँ तीन प्रकार बताए गये हैं। पहला प्रकार नवयोनि पर्यन्त चक्रों का है। ७३वें श्लोक में एक वह्नि और दो शक्तियों की चर्चा आई है। नवयोनि पद उसी की तरफ संकेत करता है, क्योंकि नवयोनि चक्र एक वह्नि और दो शक्तियों के संयोग से ही बनता है। इस तरह से नवयोनि शब्द बैन्दव, त्रिकोण और अष्टकोण—इन तीनों चक्रों की ओर संकेत करता है। उस नवयोनि चक्र के साथ दो दशार और चतुर्दशार चक्र को मिलाने पर दूसरा प्रकार बनता है। नवयोनि चक्र के ऊपर तीन वह्नि और तीन शक्ति त्रिकोणों को मिलाने से अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार—इन तीन चक्रों के बनने से भावना का दूसरा प्रकार संपन्न होता है। १. भवेदि-ग. ज. झ. उ । २. चक्रेण संयुतं-ग. ने. ज. झ. उ. । ३. तैश्च-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. तदनन्तरं तेन-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।