भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९३ न्तरमव्यवधानेन स्थितमत्यन्तं १सन्निहितम् । अष्टदलकमलेन २षोडशदलकमलेन चोपेतं चतुरस्रत्रयात्मकं तृतीयं चक्रमित्यर्थः ॥७५-७६॥ ननु ३ त्रयाणां चक्राणा मेकैकप्रकारत्वं कथमिति ? उच्यते— “प्रत्येकमंशभेदेन सर्गस्थितिलयक्रमात्” इति संकेतपद्धत्युक्तरीत्या ४एकैकचक्रावयवत्रितयस्य सृष्टि- स्थितिसंहारभेदात् क्रोडीकारः५ । तद्यथा— चतुरस्रत्रयं सृष्टिसृष्टिः, षोडशदलपद्मं सृष्टिस्थितिः, अष्टदलपद्मं सृष्टिसंहारः । एवं चक्रत्रयमयं सृष्टिमयत्वादेकम् । एवं चतुर्दशारं स्थितिसृष्टिः बाह्यदशारं स्थिति-स्थितिः, अन्तर्दशारं स्थिति- संहारः । एवं चक्रत्रयं स्थितिमयत्वादेकम् । एवमष्टकोणं संहारसृष्टिः, त्रिकोणं संहारस्थितिः, बैन्दवं संहारसंहारः । एवं चक्रत्रयं संहारमयत्वादेकम्६ । इत्येतत् सर्वं मनसि निधायाह— श्रीचक्र की भावना के उक्त दो प्रकारों के बन जाने के बाद इन्हीं से लगे हुए अष्टदल और षोडशदल कमलों से संयुक्त चतुरस्रत्रय से इस भावना का तीसरा प्रकार पूरा होता है ॥ ७५-७६॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि तीन-तीन चक्रों को मिलाकर एक-एक प्रकार कैसे बन सकता है ? इसका उत्तर यह है कि १संकेतपद्धति के अनुसार सृष्टि, स्थिति और संहार के भेद से प्रत्येक चक्र के तीन-तीन अंश बन जाते हैं । इस तरह से प्रत्येक चक्र के सृष्टि, स्थिति और संहार नामक अवयवों को मिलाकर उक्त त्रिविध भावना की जाती है । जैसे कि चतुरस्रत्रय सृष्टि-सृष्टि, षोडश दल सृष्टि-स्थिति और अष्टदल सृष्टि-संहार का प्रतीक है । इस तरह से ये तीनों चक्र सृष्टिमय होने से एक ही मान लिये जाते हैं । इसी तरह से चतुर्दशार स्थिति-सृष्टि, बाह्यदशार स्थिति-स्थिति और अन्तर्दशार स्थिति-संहार दशा वाला है । इस प्रकार ये तीन चक्र भी स्थितिमयता के आधार पर एक हैं । इसी तरह से अष्टकोण संहार-सृष्टि, त्रिकोण संहार-स्थिति और बैन्दव चक्र संहार-संहार दशा वाला है । इस तरह से ये तीन चक्र अपनी संहारमयता के आधार पर एक हैं । आगे भगवान् १. अत्यन्तमव्यवहितम्-ने. ज. झ. उ. । २. 'षोडश....त्रयात्मकं' इत्यस्य स्थाने 'चतुरस्रत्रयोपेतं चक्रत्रयोपेतं चक्रत्रयात्मकं' इति पाठः-ग. ने. ज. उ. । ३. 'ननु.... रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ४. एकेन चक्रावयवत्रितयस्य प्रत्येकस्य-ने. ज. झ. उ. । ५. कारतः-ने. ज. झ. उ. । ६. इतः परम्-'बैन्दवं चक्रमारभ्य चतुरस्रान्तोद्धारः सृष्टि- रित्यर्थः' इति सार्वत्रिकः पाठोऽत्रानावश्यकः, अग्रे विद्यमानत्वात् । I. इस विशिष्ट ग्रन्थ का परिचय नित्या. षो., उपो. पृ. ४६-४७ से तथा लुप्ता. भा. २, पृ. ७३ से प्राप्त करना चाहिये । लगता है भास्करराय के समय में भी यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं था । इस ग्रन्थ के कुछ वचनों की भास्करराय ने नित्या. षो. पंचम पटल का अंश मानकर व्याख्या की है ।

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