भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 485 में से

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९४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः चक्रस्य त्रिप्रकारत्वं कथितं परमेश्वरि । स्पष्टम् । ननु चक्रस्य त्रैविध्यमुक्तं यदि तर्हीदं चक्रं मध्यचक्रमारभ्य किमुत्पादयितुं न शक्यत इत्यत आह— सृष्टिः स्यान्नवयोन्यादिपृथ्व्यन्तं संहृतिः पुनः ॥७७॥ पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तमिति शास्त्रस्य निर्णयः । अत्र नवयोनिशब्देन ^२नवयोन्यन्तर्गतं बैन्दवं चक्रं लक्ष्यते । ^३तद् बैन्दवं चक्र- मारभ्य चतुरस्रान्तोद्धारः सृष्टिः । संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तमिति । तथा च चतुरस्रत्रयमारभ्य बैन्दवान्तमुद्धारः संहार इत्यर्थः । इति चतुःशतीशास्त्रस्य शिव कहते हैं कि इसी विभाग को मन में रखकर मैंने श्रीचक्र की त्रिविध भावना का प्रकार बताया है— हे परमेश्वरि ! इस तरह से मैंने चक्र की त्रिविध भावना का कथन किया है ॥७७॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७७॥ ऊपर चक्र की त्रिविधता का वर्णन है तथा चतुरस्र चक्र से इसका प्रारंभ बताया गया है । उसके स्थान पर किसी बीच के चक्र से भी इसकी भावना की जा सकती है, अतः इस विषय में शास्त्र की व्यवस्था बताई जा रही है— नवयोनि से चतुरस्र पर्यन्त चक्र का उद्धार सृष्टिक्रम और चतुरस्र से नव- योनि पर्यन्त उद्धार संहारक्रम कहलाता है, शास्त्र का यही निर्णय है ॥७७-७८॥ यहाँ नवयोनि शब्द से तदन्तर्गत बैन्दव चक्र का ग्रहण किया जाता है । इस बैन्दव चक्र से चतुरस्र पर्यन्त चक्र का उद्धार सृष्टिक्रम कहलाता है और चतुरस्रत्रय से बैन्दव चक्र पर्यन्त उद्धार संहारक्रम के अन्तर्गत आता है । यह ^१चतुःशतीशास्त्र का निर्णय १. सृष्टिस्थं-ख. ग. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'नव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'तद् बैन्दवं''''सृष्टिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । १. नित्याषोडशिकार्णव को अमृतानन्द चतुःशतीशास्त्र के नाम से उद्धृत करते हैं । शिवानन्द के अनुसार इसमें पूरे चार सौ श्लोक हैं । वहाँ प्रथमतः (१।२९-४१) सृष्टि- क्रम के अनुसार तथा बाद में (१।५९-७१) संहारक्रम के अनुसार श्रीचक्र का उद्धार बताया गया है । यहाँ अमृतानन्द का कहना है कि चतुःशतीशास्त्र में सृष्टिक्रम और संहारक्रम से श्रीचक्र का उद्धार बताया गया है, अतः इन दो क्रमों के अतिरिक्त किसी तृतीय क्रम से श्रीचक्र की उपासना नहीं की जा सकती । भास्करराय के अनुसार नित्या- षोडशिकार्णव के १।४२ श्लोक में इस विषय की चर्चा हुई है । इस प्रसंग में यह अवधेय है कि संहारक्रम के उद्धारक श्लोक जयरथ अथवा विद्यानन्द की व्याख्या में उपलब्ध नहीं हैं । नित्या. उपो. पृ० ९-११ में इस विषय की विस्तृत चर्चा की गई है ।

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