योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९५ निर्णयः । अतो न ¹मध्यमादिचक्रमुद्धारयतीति तात्पर्यम् । यथा देवदत्तविष्णुमित्र- यज्ञदत्तेषु प्रस्तुतेषु देवदत्तयज्ञदत्तयोः फलानि देयानीत्युक्ते विष्णुमित्रस्य न देया- नीति गम्यते, तद्वत्² ॥७७-७८॥ पूर्वं श्रीक्रममवयवशो विभज्य वासनामुक्त्वेदानीं समष्टिचक्रस्य वासनामाह— एतत्समष्टिरूपं तु त्रिपुराचक्रमुच्यते ॥७८॥ एतत्समष्टिरूपं सृष्ट्यादित्रितयं समष्टिनम । अवयवी तु तथा न भवति, सृष्टि- पदेन स्थितिपदेन संहारपदेनापि च नाभिधीयते, किन्तु ³त्रिपुराचक्रमुच्यते । त्रिपु- रायाः सृष्ट्यादिभ्यः पुरा विद्यमानत्वात् तत्पदा⁴भिधेयाया अनाद्यन्तरूपायाः स्वसं- विदश्चक्रमाविर्भावभूमिरित्युच्यते । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"वशिन्योऽष्टौ सान्त- रालम्" इत्यादिना "अनाख्या सर्वगा ततः" इत्यन्तेन ॥७८॥ है । इसलिये उक्त दो क्रमों के अतिरिक्त किसी बीच के चक्र से श्रीचक्र का उद्धार नहीं किया जा सकता । जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त की उपस्थिति में कोई कहे कि देवदत्त और यज्ञदत्त को फल दो, तो इससे यह निकलता है कि विष्णुमित्र को फल नहीं देना है, उसी तरह से चक्र के उद्धार की दो विधियों के बताने से यह निकलता है कि इनसे भिन्न कोई तीसरी विधि नहीं है ॥७७-७८॥ ऊपर श्रीचक्र को तीन अवयवों में विभक्त कर उसकी भावना का प्रकार बताया गया है, अब पूरे चक्र को एक साथ भावना करने की विधि बताई जा रही है— सृष्टि आदि तीनों विभागों को एक साथ मिला देने पर त्रिपुराचक्र परि- पूर्ण कहलाता है ॥७८॥ समष्टि शब्द का अर्थ है सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र की एकाकारता । अवयवशः यह चक्र सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के नाम से जाना जाता है, किन्तु इन सब रूपों के एक साथ मिल जाने पर ऊपर वाला विभाग भी समाप्त हो जाता है। उस समय समष्टिभूत यह अवयवी चक्र उक्त तीनों अलग-अलग नामों से अभिहित न होकर केवल त्रिपुरा चक्र के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा चक्र का अर्थ है—सृष्टि आदि तीन अवस्थाओं से पहले विद्यमान, अनादि और अनन्त स्वरूपवाली संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा का आविर्भावक चक्र। संकेतपद्धति के कुछ श्लोकों में इन व्यष्टि और समष्टि १. मध्यमारभ्य चतुःशतीशास्त्रस्य चक्रोद्धार इति-ख. ग. । २. 'तद्वत्' नास्ति-ख. ने. झ. । ३. 'किन्तु' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. । ४. नभिसन्धेयायाः-ख. ने. ज.