भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

९६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः ननु स्वसंविद्रूपा त्रिपुरैव सा ज्ञायताम्, किमेतेन चक्रवासनालक्षणेन बक- बन्धनप्रयासेनेत्यत आह— यस्य विज्ञानमात्रेण त्रिपुराज्ञानवान् भवेत् । यस्य विज्ञानमात्रेण यस्मिन् विज्ञात एव, त्रिपुराचक्रज्ञानमात्रेण त्रिपुराज्ञान- वान् ज्ञाता भवेत् । कोऽर्थः ? १शुद्धाया निराकारमूर्तेस्त्रिपुराया ज्ञानमशक्यम् । अत एवोक्तरीत्यैव एतच्चक्रवासनया२ तन्मध्ये ३बैन्दवचक्रे क्रोडीकृता सा ज्ञातुं शक्येत्यर्थः । तदुक्तमभियुक्तैः— चक्रों का स्वरूप प्रदर्शित हैं । १ऋजुविमर्शिनी और अर्थरत्नावली (नि. पो. पृ. ६५-६६) में इस विषय को देखना चाहिये ।।७८।। अब प्रश्न उठता है कि जब श्रीचक्र में त्रिपुरा का निवास है, तो हम स्वसंवित्- स्वरूपिणी त्रिपुरा को जानने का ही प्रयास क्यों न करें, बगुले को पकड़ने के प्रयास सरीखे इस चक्र-वासना के चक्कर में पड़ने से क्या लाभ है ? इसका उत्तर आगे देते हैं— इस त्रिपुरा भगवती के चक्र को सही तरह से जान लेने वाले व्यक्ति को त्रिपुरा का ज्ञान अपने आप हो जाता है ॥७९॥ जिसके जान लेने पर, अर्थात् ऊपर वर्णित विविध वासनाओं के माध्यम से इस श्रीचक्र के स्वरूप को ठीक तरह से समझ लेने पर साधक त्रिपुरा के स्वरूप का ज्ञाता हो जाता है । इसका भाव यह है कि शुद्ध निराकार स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा को समझ पाना कठिन है । इसीलिये ऊपर बताई गई विविध वासनाओं के सहारे इस श्रीचक्र के मध्य में विराजमान बैन्दव चक्र में अपने स्वरूप को छिपा कर बैठी हुई भगवती को जाना जा सकता है, जैसा कि सुभगोदयवासनाकार२ शिवानन्द ने कहा है— १. शुद्धनिरा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. नायास्त-ने. झ. उ. । ३. बैन्दवे क्रोडी- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. इस प्रसंग में ऋजुविमर्शिनीकार ने संकेतपद्धति के तीन श्लोक उद्धृत किये हैं । उनमें सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के निरूपण के बाद चतुर्थ अनाख्या चक्र की चर्चा की गई है । दीपिका में तृतीय श्लोक के प्रारंभ और अन्त का कुछ अंश मात्र उद्धृत है । इसमें अष्टकोण, त्रिकोण और बिन्दुचक्र की संहारात्मकता का तथा सम्पूर्ण चक्र की अनाख्यता का उल्लेख है । अर्थरत्नावली में उद्धृत वचनों में यह विषय भिन्न पद्धति से वर्णित है । २. इस ग्रन्थ का परिचय पृ. ७१ की पहली टिप्पणी में दिया जा चुका है ।