भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९७ घृतकाठिन्यवच्चक्रमहायोनौ चिदम्बरम् । द्रुतहेमघनीभावमिव ¹मूर्तीकरोम्यहम् ॥ (सु० वा० ३६) इति । चक्रस्य पूर्वमुद्दिष्टं नवधात्वमिदानीं वक्तुं प्रतिजानीते— चक्रस्य नवधात्वं च कथयामि तव प्रिये ॥७९॥ यतः प्रियतमाऽसि त्वम्, अतो रहस्यमपि कथयामीत्यर्थः ॥७९॥ इदानीं नवधा²त्वमेवाह— आदिमं भूत्रयेण स्याद् द्वितीयं षोडशारकम् । अन्यदष्टदलं प्रोक्तं मनुकोणमनन्तरम् ॥८०॥ पञ्चमं दशकोणं स्यात् षष्ठं चापि दशारकम् । सप्तमं वसुकोणं स्यान्मध्यँत्र्यस्रमथाष्टमम् ॥८१॥ नवमं त्र्यस्रमध्यं स्यात् मैं चक्र की महायोनि में, अर्थात् बैन्दव चक्र में, जमे हुये घृत के¹ समान घनीभूत स्वरूप वाली संवित्कला का पिघले हुए सुवर्ण के घनीभूत स्वरूप-सदृश कान्ति वाली चिदम्बर की मूर्ति बना कर ध्यान करता हूँ ॥७९॥ चक्र की त्रिविध भावना के उपदेश के बाद अब पूर्वसूचित नवविध भावना का वर्णन करते हैं— हे प्रिये, अब मैं चक्र की नवविध भावना को कहता हूँ ॥७९॥ तुम मेरी प्रियतमा हो, अतः इस रहस्य को भी अब मैं तुम्हारे सामने खोल रहा हूँ ॥७९॥ अब चक्र की नवविधता का वर्णन किया जाता है— चतुरस्र त्रय से पहला प्रकार बनता है, षोडशार से दूसरा, अष्टदल से तीसरा, चतुर्दशार से चौथा, बाह्यदशार से पांचवां, अन्तर्दशार से छठा, अष्ट- कोण से सातवाँ, मध्यत्र्यस्र (मध्य त्रिकोण) से आठवाँ और त्र्यस्रमध्य (त्रिकोण मध्यगत बिन्दु) से नवाँ प्रकार बनता है ॥८०-८२॥ १. मूर्तिमिति सार्वत्रिकः पाठः । २. धात्वमाह–ख. ग. नै. ज. झ. उ. । ३. मध्यं– च. छ. ज. झ. ।

  1. प्रस्तुत श्लोक में संवित्कला के स्वरूप की घनीभूत घृत से तथा चिदम्बर मूर्ति की पिघले हुए सुवर्ण के घनीभूत स्वरूप से तुलना की गई है । इससे संवित्कला के घृत सदृश कोमल दयार्द्र स्वरूप की तथा चिदम्बर मूर्ति के तप्त हेमसदृश स्वरूप के आवाहन के बाद उसके निष्कल और सकल स्वरूप के ध्यान की विधि बताई गई है । ७