योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः भूत्रयेण चतुरस्रत्रयेण। मनुकोणं चतुर्दशारम्। वसुकोणम् अष्टकोणम्। स्पष्टमन्यत् ॥८०-८२॥ उक्तानां नवचक्राणां नामान्याह— तेषां नामान्यतः शृणु। त्रैलोक्यमोहनं चक्रं सर्वाशापरिपूरकम् ॥८२॥ सर्वसंक्षोभणं गौरि सर्वसौभाग्यदायकम्। सर्वार्थसाधकं चक्रं सर्वरक्षाकरं परम् ॥८३॥ सर्वरोगहरं देवि सर्वसिद्धिप्रदं तथा। सर्वानन्दमयं चापि नवमं शृणु सुन्दरि ॥८४॥ त्रैलोक्यमोहनम्। लोक्यत इति लोकः, लोक्यतेऽनेनेति लोकः, लोकयतीति लोक इति कर्मकरणकर्तृव्युत्पत्त्या मेयमानमातृलक्षणं त्रैलोक्यम्, तस्य मोहनं तिरोधायकमद्वैतप्रतीत्युत्पादनेन। सर्वाशापरिपूरकम्। आशा नाम अतृप्तस्य भूत्रय चतुरस्रत्रय को कहते हैं। ^१मनुकोण चतुर्दशार को और वसुकोण अष्टकोण को कहते हैं। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥८०-८२॥ उक्त नवचक्रों के नाम बताते हैं— अब उनके नाम सुनो। त्रैलोक्यमोहन चक्र पहला और सर्वाशापरिपूरक चक्र दूसरा है। हे गौरि! सर्वसंक्षोभण चक्र तीसरा, सर्वसौभाग्यदायक चौथा, सर्वार्थ- साधक चक्र पांचवाँ और सर्वरक्षाकर छठा चक्र है। हे देवि! सातवें चक्र का नाम सर्वरोगहर और आठवें का नाम सर्वसिद्धिप्रद है। हे सुन्दरि! तुम सुनो कि नवें चक्र का नाम सर्वानन्दमय है ॥८२-८४॥ १. त्रैलोक्यमोहन शब्द में जो लोक शब्द है, उसकी कर्म, करण और कर्ता के अर्थ में त्रिविध व्युत्पत्ति की जाती है—जो देखा जाता है, जिससे देखते हैं और जो देखता है। इनसे क्रमशः मेय, मान और माता का ग्रहण होता है। इन तीनों के समाहार का नाम त्रैलोक्य है। यह चक्र इस त्रैलोक्य का मोहन करने वाला है, अद्वैत दृष्टि को उत्पन्न कर यह चक्र इस त्रैलोक्य को तिरोहित कर देता है। २. सर्वाशापरिपूरक पद में विद्य- १. चतुर्दशकोणं स्पष्ट-ख. ग. ज. झ. उ.। २. सर्वक्षोभकरं-ख. ग. च. छ. झ. उ.। ३. देवि-झ. उ.।
- पुराणों में एक कल्प में १४ मनुओं की स्थिति मानी जाती है, अतः मनुकोण शब्द से यहाँ चतुर्दश कोणात्मक चतुर्दशार चक्र गृहीत होता है। इसी तरह से वसु देवों की आठ संख्या के आधार पर वसुकोण शब्द अष्टकोण का वाचक है।